मुंबई: सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्ल), उनके साथियों और उनके वंशजों को लेकर की जाने वाली अपमानजनक टिप्पणियों से निपटने के लिए गठित किए गए तहफ्फुज ए नामुस ए रिसालत बोर्ड का पहला सम्मेलन जामिया कादरिया अशरफिया मस्जिद में हुआ। जिसमे राज्य के अहले सुन्नत वल जमात के प्रमुख उलेमाओं ने हिस्सा लिया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए रज़ा एकेडमी के प्रमुख अल्हाज सईद नुरी ने कहा कि फेसबुक, ट्वीटर, यूट्यूब पर इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक बयान देना आम हो गया है। आज हर कोई हजरत मुहम्मद (सल्ल) की शान में गुस्ताखी कर देता है। लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। सिर्फ एफ़आईआर दर्ज होकर फाइलों में दब जाती है और आरोपी आजाद घूमते रहते है। उन्होने कहा कि वक्त की जरूरत है कि मुसलमान एक लीगल सेल गठित करे। जो ऐसे लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचाए। उन्होने देश भर में मस्जिदों के इमामों से भी इस मसले पर मुस्लिमों को जागरूक करने की अपील की।

किछौछा शरीफ के सज्जादनशीन सय्यद मोइनूद्दीन अशरफी ने तहफ्फुज ए नामुस ए रिसालत बोर्ड का गठन इस मामले एक में बेहतरीन कदम बताया। उन्होने कहा कि मुसलमान के लिए नामुस ए रिसालत सब कुछ है। जिसके लिए वह सबकुछ कुर्बान कर सकता है। उन्होने रज़ा एकेडमी को हर संभव मदद देने का भी आश्वासन दिया।

मौलाना अमानुल्लाह ने कहा कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आढ़ में इस्लाम धर्म के अपमान की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होने शरजील उस्मानी के मामले का भी हवाला दिया। उन्होने सवाल उठाया कि जिस तरह शरजील उस्मानी के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने तेजी दिखाई। ऐसे मुस्लिमों से जुड़े मामलों में क्यों नहीं दिखती।

वहीं अब्बास रिजवी ने बोर्ड से जुड़ी जानकारी देते हुए कहा कि बोर्ड की और से सोशल मीडिया से जुड़े एक्सपर्ट और कानूनों मामलों के लिए वकीलों की अलग-अलग पेनल बनाया जा रहा है। जो देश के हर संसदीय क्षेत्र से बोर्ड से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा भेजे गए मामलों को देखेंगे और उन पर कार्रवाई करेंगे।

इस दौरान मौलाना अब्दुल जब्बार कादरी, मौलाना खलील-उर-रहमान नूरी, सुबहानी मियां, हाशमी मियां, कारी नियाज़ सलमान रज़ा और अन्य विद्वान मौजूद रहे।