निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण से संबंधित मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केंद्र ओपचारिक रूप से ये कह दे कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को ‘कूड़ेदान में फेंक दिया है’.

दरअसल, केंद्र की और से भवन व अन्य निर्माण श्रमिक (रोज़गार नियमन व सेवा शर्त) कानून-1996 के कार्यान्वयन नहीं करने को लेकर  सुप्रीम कोर्ट ने ये कड़ी आलोचनात्मक टिप्पणी की है.

न्यायाधीश मदन बी. लोकुर व न्यायाधीश दीपक गुप्ता की पीठ ने अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल (एएसजी) मनिंदर सिंह से कहा, ‘आप सही बात क्यों नहीं करते, हमें बताइए. आप एक हलफनामा दाख़िल कीजिए कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश निरर्थक हैं और उसे कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया है, इसलिए अब कोई आदेश जारी नहीं करें.’

केंद्र की और से इस क़ानून के तहत उपकर के रूप में 37,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि संग्रहित की गई है. जिसका प्रयोग लैपटॉप व वॉशिंग मशीन ख़रीदने के लिए ख़र्च किया जा रहा है. इस बात की जानकारी नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर दी है.

ध्यान रहे नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर सेंट्रल लेजिस्लेशन ऑन कंस्ट्रक्शन लेबर नाम के गैर सरकारी संगठन ने जनहित याचिका दायर करके आरोप लगाया था कि निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों के कल्याण के लिए रीयल एस्टेट कंपनियों से उपकर लगाकर पूंजी एकत्र की गई थी. उन्होंने कहा था कि इस पूंजी का सही से इस्तेमाल नहीं हो रहा है क्योंकि लाभ देने के लिए लाभार्थियों की पहचान के लिए कोई तंत्र नहीं है.

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