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नई दिल्ली। असम के एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) में 40 लाख लोगों का नाम हटाने के खिलाफ भारत के मुस्लिम छात्रों के सबसे बड़े संगठन मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया (एमएसओ) ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल की है। एमएसओ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई जल्द करेगा।

एमएसओ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शुजात अली कादरी ने कहा कि एनआरसी में अपने ही देश के लोगों को बाहरी बताने की साजिश हो रही है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक है। शुजात अली कादरी ने सवाल उठाया कि आखिर ये कैसे संभव है कि एक ही घर में रहने वाले पिता को भारतीय नागरिक माना जा रहा है, जबकि बेटे को बाहरी को बताया जा रहा है। शुजात अली कादरी ने हैरानी जताते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव लड़ चुके लोगों का नाम जब एनआरसी लिस्ट से गायब है तो इसे कैसे सच माना जा सकता है।

आपको बता दें कि इस मुकदमें में भारत सरकार समेत सात एजेंसियों को उत्तरदायी बनाया गया है। मुक़दमें में मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि एनआरसी के डॉक्यूमेंटेशन में भारी गड़बड़ियाँ की गई हैं। इससे एक मानव निर्मित समस्या खड़ी हो गई है। आपको बता दें कि असम में 30 जुलाई, 2018 को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम ड्रॉफ्ट जारी कर दिया गया। इसमें शामिल होने के लिए असम में 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था, जिसमें से 40.07 लाख आवेदकों को जगह नहीं मिली। एमएसओ का कहना है कि चालीस लाख लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने का मौका मिलना चाहिए क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति और असम की पूर्व मुख्यमंत्री को भी लिस्ट में जगह नहीं मिली, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि नौकरशाही ने सुप्रीम कोर्ट की मंशा के अनुसार कार्य नहीं किया और नौकरशाही की अकर्मण्यता की कीमत आम भारतीय नहीं चुका सकते।

शुजात अली कादरी ने कहा कि राजनीतिक तौर पर इस मुद्दे को मुस्लिम बनाम अन्य बनाया जा रहा है, जबकि एनआरसी लिस्ट से बहुत से हिन्दू और दूसरे धर्म के लोग भी प्रभावित हैं। शुजात अली कादरी ने साफ किया है कि एमएसओ एनआरसी लिस्ट में प्रभावित सभी लोगों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ेगी चाहे उसमें हिन्दू धर्म के प्रभावित लोग हों या फिर इस्लाम से ताल्लुक रखने वाला हो।

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एमएसओ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शहबाज मिस्बाही ने कहा कि एनआरसी प्रभावित लोगों को इंसाफ मिलेगा। संविधान हर नागरिक को उसका अधिकार देती है और सुप्रीम कोर्ट को संविधान का संरक्षक माना जाता है, ऐसे में हमें पूरी उम्मीद है कि कोर्ट से न्याय मिलेगा। शाहबाज मिस्बाही ने मीडिया की उन खबरों का हवाला देते सवाल किया आखिर ये कैसी लिस्ट है जिसमें पूर्व राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद के परिवार के लोगों का नाम है। दरअसल पिछले दिनों खबर आई थी कि एनआरसी लिस्ट में फखरूद्दीन अली अहमद के पोते का नाम भी एनआरसी लिस्ट में शामिल है।

आपको बता दें कि असम पहला राज्य है जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। एनआरसी का पहला मसौदा 31 दिसंबर और एक जनवरी की रात जारी किया गया था, जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे।

असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ की खबरों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था। पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं। 1947 में बंटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। 1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी।

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