बांबे हाईकोर्ट की अर्णब गोस्वामी के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर कार्रवाई न करने के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हम चाहते हैं कि रिपब्लिक टीवी और उसके संपादक में जिम्मेदार रिपोर्टिंग का अहसास हो।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है लेकिन उस आधार पर कोई ये नहीं कह सकता कि पूछताछ नहीं हो सकती है। कोर्ट के लिए ये सुनिश्चित करना जरूरी है कि समाज में शांति और सद्भाव बना रहे। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक चर्चा करने का ऐसा तरीका ठीक नहीं है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और अर्णब गोस्वामी को निर्देश दिया कि वे अपना-अपना हलफनामा दाखिल करें, जिसमें गोस्वामी और रिपब्लिक चैनल के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर का जिक्र हो।

दरअसल, बांबे हाईकोर्ट ने पिछले जून महीने में अर्णब गोस्वामी के खिलाफ दर्ज दो अलग-अलग एफआईआर पर आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। दोनों एफआईआर में अर्णब गोस्वामी पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगाया गया था। दोनों एफआईआर पालघर में दो साधुओं की हत्या के मामले में रिपब्लिक टीवी के शो से संबंधित था। हाईकोर्ट ने अर्णब गोस्वामी के खिलाफ किसी भी निरोधात्मक कार्रवाई पर भी रोक लगा दी थी।

इन एफआईआर के खिलाफ अर्णब गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने एक एफआईआर पर ही कार्रवाई का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब को निर्देश दिया था कि वो एफआईआर निरस्त करने के लिए उचित फोरम में जा सकते हैं। उसके बाद अर्णब गोस्वामी ने बांबे हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद बांबे हाईकोर्ट ने एफआईआर पर आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बांबे हाईकोर्ट का फैसला गलत है। सिंघवी ने कहा कि अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा और बिना पूर्व नोटिस के लिए उन्हें समन नहीं किया जाएगा। लेकिन ये संदेश जरूर जाना चाहिए कि कोई भी कानून के ऊपर नहीं है।

वहीं गोस्वामी की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि एफआईआर सही नहीं है। उन्होंने कहा कि हाल ही में मुंबई पुलिस ने चैनल के पूरे एडिटोरियल स्टाफ और चैनल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, यह पूरी तरह से अभिव्यक्ति की आजादी और पत्रकारिता का गला घोंटने के समान है।

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