सुप्रीम कोर्ट ने विस्थापितों से जुडी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को शिवराज सरकार को जमकर लताड़ लगाई.

दरअसल, शिवराज सरकार ने  2008 की नई पुनर्वास नीति मध्य प्रदेश आदर्श पुनर्वास नीति के तहत बांधों के निर्माण की वजह से विस्थापित हुए परिवारों को 50 हजार रुपये के मुआवजे देने की घोषणा की थी. लेकिन मुआवजा सिर्फ 11 हजार रुपये का दिया गया.

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ऐडवोकेट संजय पारेख ने चीफ जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली बेंच को बताया कि राहत और पुनर्वास के नाम पर किया जा रहा है इस तरह का भेदभाव पूरी तरह से अमानवीय है. उन्होंने आगे बताया कि खड़क बांध के सिंचाई प्रॉजेक्ट की वजह से करीब 370 परिवार बेघर हो गए और इन्हें राज्य सरकार की 2002 की पॉलिसी के तहत महज 11 हजार रुपये का मुआवजा दिया गया.

इस पर जस्टिस खेहर, एन वी रमन्ना और डी वाई चंद्रचूड़ की बेंट ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘आप उनके साथ जानवरों जैसा सलूक कर रहे हैं। आपको उन्हें उचित मुआवजा देना चाहिए।’ बेंच ने आदेश दिया कि प्रभावित परिवारों को तुरंत 50 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि बांध की वजह से विस्थापित हुए परिवारों को राहत और पुनर्वास पैकेज देने के लिए राज्य सरकार तुरंत प्रभाव से शिकायत निवारण के लिए 3 संस्थाओं की स्थापना करे. हर संस्था की अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त जिला जज करेंगे.

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