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नई दिल्ली | नोट बंदी पर मोदी सरकार की मुश्किलें बढती जा रही है . एक तरफ देश में कैश की किल्लत है तो दूसरी तरफ विपक्ष सरकार पर लगातार हमले बोल रहा है. हालाँकि सरकार नोट बंदी को राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर इसके नुक्सान के बारे में बोलने वालो का मुंह बंद कर देती है. लेकिन सरकार की मुश्किलें इससे कम होने वाली नही है. अब इस मामले देश भर की अदालतों में याचिका डाली जा रही है.

ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 10 सवाल पूछे है. यह सवाल सरकार के लिए किसी झटके से कम नही है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पुछा है की-:

  1. क्या नोट बंदी, आरबीआई एक्ट का उलंघन है?
  2. क्या 8 नवम्बर और उसके बाद सरकार के द्वारा की गयी सारी अधिसूचनाए अवैधानिक है?
  3. क्या नोट बंदी करने से पहले सरकार ने कोई तैयारी की?
  4. क्या लोगो तक कैश पहुंचाने और वितरण करने की सुचारू व्यवस्था थी?
  5. क्या सहकारी बैंकों पर लगाई गयी रोक सही है?
  6. क्या इससे समानता-स्वतंत्रता के अधिकारों का उलंघन तो नही ?
  7. क्या बैंकों और एटीएम से नकदी की सीमा तय करना लोगो के अधिकारों का उलंघन नही?
  8. क्या अदालतों को आर्थिक नीतियों में दखल देने का अधिकार है?
  9. क्या नोट बंदी का फैसला बिना संसद की मंजूरी लिए किया जा सकता था?
  10. क्या संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राजनितिक दलों द्वारा डाली गयी याचिकाओ पर विचार किया जा सकता है?

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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया की कोई भी निचली अदालत नोट बंदी की याचिकाओ पर सुनवाई नही करेगी. सभी याचिकाए सुप्रीम कोर्ट स्थान्तरित की जाए. इसके अलवा सुप्रीम कोर्ट ने पुराने नोटों को जमा करने की अंतिम तारीख को भी आगे बढाने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा की इसका फैसल सरकार को करना है, हम इसमें दखल नही देंगे. मालूम हो की कल ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया था की आम आदमी को 2000 रूपए नही मिल रहे है और कुछ के पास करोडो रूपए कैसे आ रहे है?

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