Friday, July 30, 2021

 

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: क्या सिख पंजाब में अल्पसंख्यक हो सकते हैं

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सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से इस मसले पर उसकी राय पूछी है कि एक अल्पसंख्यक समुदाय क्या दूसरे किसी राज्य में इस दर्जे का हकदार है, जहां उसकी अच्छी खासी तादाद है

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से इस मसले पर उसकी राय पूछी है कि एक अल्पसंख्यक समुदाय क्या दूसरे किसी राज्य में इस दर्जे का हकदार है, जहां उसकी अच्छी खासी तादाद है और सामाजिक और पेशेवराना स्थिति बेहतर है। अदालत का यह सवाल केंद्र की राजग सरकार को धर्मसंकट में डाल सकती है और अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर उसे अपनी नीति पर फिर से गौर करना पड़ सकता  है।

प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाले एक खंडपीठ ने सोमवार को एक व्यवस्था में कहा कि सिखों को पंजाब में अल्पसंख्यक कैसे माना जा सकता है। इस लिहाज से वे दिल्ली में भी अल्पसंख्यक नहीं माने जा सकते। हमारा विचार यह है कि संख्यातमक शक्ति या उनकी तादाद के आधार पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक मानने का संकेत नहीं माना जा सकता। उनकी समृद्धि, सामाजिक स्थिति वगैरह की भी एक भूमिका है जिसके आधार पर यह दर्जा तय हो सकता है।

इस मामले में भारत के अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी से सहयोग मांगते हुए अदालत ने पूछा कि क्या कश्मीर में मुसलमान, पंजाब में सिख, नगालैंड और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में ईसाइयों को अल्पसंख्यक मानना चाहिए। हमारी राय में आर्थिक और सामाजिक स्थिति सरकारी नौकरियों में लोगों की तादाद और अन्य कारक ऐसे हैं जिनके आधार पर एक राज्य से दूसरे राज्य में अल्पसंख्यक दर्जा अलहदा हो सकता है।

यह पीठ शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी व अन्य की उस याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें मांग की गई थी कि पंजाब में उनकी शिक्षण संस्थाओं का अल्पसंख्यक दर्जा स्थायी तौर पर बहाल किया जाए। इससे उन्हें विभिन्न फायदों के अलावा अपनी भाषा, संस्कृति के सरंक्षणमें मदद मिलेगी। पंजाब सरकार ने 2001 और 2006 में दो अधिसूचनाएं जारी कर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से संचालित संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा दिया था, इनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी हैं। इसके तहत एसजीपीसी को पचास फीसद सीटें सिख समुदाय के छात्रों के लिए आरक्षित करने का अधिकर मिला था।

लेकिन 2007 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दोनों अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया। अदालत का कहना था कि सिख पंजाब में अल्पसंख्यक दर्जे के पात्र नहीं हैं। राज्य में उनकी संख्या सबसे ज्यादा है। 2008 में एसजीपीसी ने सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी थी और अदलत ने स्टे दे दिया था। अब यह मामला संविधान पीठ के पास है जिसकी सुनवाई पिछले हफ्ते शुरू हुई। पीठ ने पूछा कि सिख छात्र पंजाब में बहुसंख्यक समुदाय से संबद्ध हैं, इसलिए उन्हें अल्पसंख्यक कोटे के तहत प्रवेश क्यों दिया जाए। साभार: जनसत्ता

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