सेक्शन 377 के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने फैसला सुनाते हुए आज LGBT समुदाय के रिश्तों को मान्यता प्रदान कर दी है। बेंच ने गुरुवार को एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत सहमति से परस्पर अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध था।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की थी और 10 जुलाई को सुनवाई शुरु होने के बाद 17 जुलाई को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जहां तक एकांत में परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन कृत्य का संबंध है तो यह न तो नुकसानदेह है और न ही समाज के लिए संक्रामक है।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार कुमार ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट की तरह हम भी इसे अपराध नहीं मानते हैं। हालांकि, समलैंगिक संबंध और रिश्ते प्राकृतिक नहीं होते और न ही हम इस तरह के संबंधों को बढ़ावा देते हैं।” सीजेआई ने टिप्‍पणी की, ‘किसी को भी उसके व्‍यक्तिगत अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। समाज अब व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता के लिए बेहतर है। मौजूदा मामले में विवेचना का दायरा विभिन्‍न पहलुओं तक होगा।’

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कोर्ट के इस फैसले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने कहा कि समलैंगिक संबंध प्राकृतिक नहीं होते हैं। वह ऐसे रिश्तों का समर्थन नहीं करते। बयान में कहा गया कि “समलैंगिकों का शादी करना व इस तरह के संबंध प्रकृति के अनुकूल सही नहीं हैं, लिहाजा हम इनका समर्थन नहीं करते हैं। भारतीय समाज ऐसे रिश्तों को मान्यता नहीं देता। मनुष्य अनुभवों से सीखता है, इसलिए इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए।”

बता दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा (IPC) की धारा 377 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति प्रकृति के नियमों के खिलाफ जाकर किसी पुरुष, स्त्री या पशु से अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाता है तो  इसे अपराध माना जाएगा। इस मामले में दोषी पाए जाने पर उम्रकैद या फिर 10 साल कैद और आर्थिक दंड का प्रावधान है। इस धारा के दायरे में वो लोग भी हैं जो सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं।

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