तीन तलाक को अपराध घोषित करने संबंधी अध्यादेश के खिलाफ सुन्नी मुस्लिम उलेमा संगठन ‘समस्त केरल जमीयत-उल उलेमा’ ने सु्प्रीम कोर्ट चुनौती दी है।

एएनआई की खबर के मुता​बिक जमीयत-उल उलेमा’ ने सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर लाए गए अध्यादेश को मुस्लिमों के पर्सनल लॉ में दखल और उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला फैसला बताया है। बता दें कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस अध्यादेश को 19 सितंबर की रात हस्ताक्षर कर मंजूरी दी है।

याचिका में तीन तलाक अध्यादेश को अंसवैधानिक करार देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह अध्यादेश मनमाना और भेदभावपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि यह अध्यादेश समानता के अधिकार और जीने के अधिकार का हनन करता है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाना चाहिए।

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तीन तलाक (मुस्लिम महिला, विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिल चुकी है और यह राज्यसभा में लंबित है। विपक्ष इसमें कुछ संशोधन की मांग कर रहा है। केंद्र सरकार के पास अब इस बिल को 6 महीने में पास कराना होगा।

उल्लेखनीय है कि संविधान में अध्यादेश का रास्ता बताया गया है। किसी विधेयक को लागू करने कि लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। संविधान के आर्टिकल 123 के जब संसद सत्र नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति केंद्र के आग्रह पर कोई अध्यादेश जारी कर सकते हैं।

ध्यादेश सदन के अगले सत्र की समाप्ति के बाद छह हफ्तों तक जारी रह सकता है। जिस विधेयक पर अध्यादेश लाया जाता है, उसे संसद में अगले सत्र में पारित करवाना ही होता है। ऐसा नहीं होने पर राष्ट्रपति इसे दोबारा भी जारी कर सकते हैं।

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