सुदर्शन टीवी के यूपीएससी जिहाद कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने और चैनल को देश के लिए नुकसानकारी बताने के बाद केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट मीडिया नियमन के मुद्दे पर कोई फैसला लेता है तो पहले यह डिजिटल मीडिया के संबंध में लिया जाना चाहिए।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी के ‘UPSC जिहाद’ शो पर यह कहकर रोक लगा दी थी कि  ‘सुदर्शन टीवी देश को नुकसान पहुंचा रहा है और ये स्वीकार नहीं कर रहा है कि भारत विविधता से मिलकर बना है।’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने का है। हम केबल टीवी एक्ट के तहत गठित प्रोग्राम कोड के पालन को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। एक स्थिर लोकतांत्रिक समाज की इमारत और अधिकारों और कर्तव्यों का सशर्त पालन समुदायों के सह-अस्तित्व पर आधारित है। किसी समुदाय को कलंकित करने के किसी भी प्रयास से निपटा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा था कि हमारी राय है कि हम पांच प्रतिष्ठित नागरिकों की एक समिति नियुक्त करें जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ मानकों के साथ आ सकते हैं। हम कोई राजनीतिक विभाजनकारी प्रकृति नहीं चाहते हैं और हमें ऐसे सदस्यों की आवश्यकता है जो प्रशंसनीय कद के हों।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (Information and broadcasting ministry) की ओर से दायर जवाबी हलफनामे में कहा गया, ”अगर कोर्ट कोई फैसला लेता है तो यह पहले डिजिटल मीडिया के संदर्भ में लिया जाना चाहिए, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया से संबंधित पर्याप्त रूपरेखा एवं न्यायिक निर्णय पहले से मौजूद हैं।

केंद्र ने हलफनामे में कहा गया, ”मुख्यधारा के मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट) में प्रकाशन, प्रसारण एक बार ही होता है, वहीं डिजिटल मीडिया की व्यापक पाठकों/दर्शकों तक पहुंच तेजी से होती है और वॉट्सऐप, ट्विटर और फेसबुक जैसी कई इलेक्ट्रॉनिक एप्लिकेशन्स की वजह से जानकारी के वायरल होने की भी संभावना है।”

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