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जम्मू कश्मीर के पत्रकार और राइजिंग कश्मीर के चीफ एडिटर शुजात बुखारी की पिछले हफ्ते श्रीनगर में हत्या कर दी गई थी। अब उनके बेटे तहमीद बुखारी का लेख ‘राइजिंग कश्मीर’ में छपा है।

10वीं में पढ़ने वाले तहमीद ने अपना दर्द बयां करते हुए लिखा कि  उस दिन को नहीं भुला पा रहा जब मुझे यह मन्हूस खबर मिली थी। मैं अस्पताल पहुंचा था और किसी को कहते थे सुना कि आप नहीं रहे। मेरी टांगे चलना बंद हो गईं थीं, हाथ सुन्न हो गये थे पर कहीं न कहीं उम्मीद थी कि आप ठीक हो, आप अभी उठोगे और मुझे गले लगा लोगे।

तहमीद ने आगे लिखा है, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आपके साथ कोई ऐसा कैसे कर सकता है। आप उसूलों वाले इन्सान थे। कभी किसी को बुरा नहीं कहा। मैने हजारों लोगों को आनके लिए दुआ करते देखा था। आपके लिए आंसू बहाते देखा था। मेरे पापा के सच्चे उसूलों को कई पसन्द नहीं करते थे पर उन्होंने फिर भी किसी को कभी कुछ नहीं कहा।

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जिस वक्त मैं एबुलेंस के अंदर रो रहा था, मुझे ऐसा लग रहा था कि काश वे उठ खड़े होंगे और मुझे गले लगा लेंगे। पापा सिद्धान्तों वाले आदमी थे। यह बात मैं अच्छी तरह जानता हूं। मेरे पिता हजारों नफरत करने वाले लोगों से घिरे रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी के लिए कड़वे शब्द नहीं बोले।

वे कश्मीरी भाषा के बारे में भावकु थे। उन्हें अपनी मातृभाषा से प्रेम था। कश्मीर के स्कूलों में 10वीं तक बच्चों को कश्मीरी पढ़ाई जाए उनका यह बुहप्रतिक्षित सपना जून 2017 में पूरा हुआ था। कश्मीर में शांति लाने के लिए उन्होंने कई संगठनों के साथ दुनिया के हर महाद्वीप में हजारों सम्मेलनों में भाग लिया।

उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शांति के लिए काम किया और इसी के लिए अपनी जान भी दे दी। उन्हें आशा थी कि एक दिन कश्मीर में मासूम लोगों को अपनी जान नहीं गवानी पड़ेगी। 1990 में सेना और आतंकवादियों की क्रॉसफायरिंग में उनके दो चचेरे भाइयों की मौत हो गई थी और अब कश्मीर की उथल-पुथल में हमारे परिवार का तीसरा सदस्य मारा गया है।

दो साल पहले उन्हों स्ट्रोक का सामना करना पड़ा था। शायद उस समय भी वो दुनिया छोड़ सकते थे। लेकिन अल्लाह ने उन्हें अपने पास बुलाने के लिए रमजान के जुमातुल विदा जैसे पाक दिन को चुना। इस जालिम दुनिया में वह फिट नहीं थे। उनके जैसे पवित्र इंसान को अल्लाह अपने साथ चाहते हैं। अल्लाह उन्हें जन्नत में सबसे ऊंची जगह बख्शे।”

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