नई दिल्ली | नोट बंदी के बाद लोगो को हो रही कैश की दिक्कत से बचने के लिए सरकार ने डिजिटल माध्यम से पेमेंट करने की अपील की थी. लोगो को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने डिजिटल पेमेंट करने वालो के लिए कुछ आकर्षक स्कीम भी लांच की. इसके अलावा पेट्रोल पम्प पर कार्ड से पेमेंट करने पर छूट देने का भी एलान किया गया था. सरकार की इस पहल का लोगो ने स्वागत किया और काफी हद तक डिजिटल माध्यम को अपनाया भी.

लेकिन बैंकों की मनमानी की वजह से लोग कैशलेस व्यवस्था से दूर जाने लगे है. दरअसल डेबिट/क्रेडिट कार्ड से किये जाने वाले ज्यादातर पेमेंट पर बैंक सर्विस चार्ज वसूलता है. पेट्रोल पम्प से लेकर बिजली के बिल का पेमेंट करने तक उपभोक्ता को भारी भरकम राशी , सर्विस चार्ज के रूप में बैंकों को देनी पड़ती है. कैशलेस इकॉनमी की बात करने वाली हमारी सरकार बैंकों की इस मनमानी पर लगाम लगाने में असफल रही है.

इसके अलावा देश की कुछ ऐसे इलाके भी है जहाँ लोगो को कैशलेस के बारे कुछ भी जानकारी नही है. नोट बंदी के बाद जब नोट की किल्लत हुई तो इन लोगो को डेबिट कार्ड से पेमेंट करने की सलाह दी गयी. उस समय मज़बूरी में इन्होने सरकार का साथ दिया लेकिन जब अपने खातो की जांच की तो पाया की ज्यादातर खरीदारी में बैंक ने कुछ अतिरिक्त शुल्क वसूला है.

बस्तर जिले के आदिवासी, सरकार की इस व्यवस्था से बहुत परेशान नजर आ रहे है. जगदलपुर के रहने वाले एक ट्रक मालिक के अनुसार उसने पट्रोल पम्प से डीजल खरीदने के लिए कार्ड से पेमेंट किया था. करीब 11 हजार 500 रूपए के डीजल पर बैंक ने करीब 300 रूपए सर्विस चार्ज वसूल लिया. इस तरह के पांच ट्रांसेक्सन में बैंक ने सर्विस चार्ज वसूला.

बैंकों की इस मनमानी का शिकार केवल ट्रक मालिक ही नही बल्कि दुकानदार भी है. इसी जिले के एक दुकानदार के अनुसार अगर हमें हर महीने बैंकों को सर्विस चार्ज के रूप में तीन से चार हजार रूपए बैंक को देने पड़ेंगे तो हम इस व्यवस्था के साथ क्यों जुड़ना पसंद करेंगे. यह अकेले इन्ही लोगो की समस्या नही बल्कि सभी लोग इससे ग्रस्त है. बैंक नोट बंदी का फायदा उठा अपनी जेबे भरने में लगा है. न ही सरकार और न ही आरबीआई इस मामले में लोगो की मदद करती दिख रही है.


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