Saturday, October 23, 2021

 

 

 

Ravish के ‘शो’ के बाद नामी-गिरामी पत्रकार आपस में ही भिड़ें !

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Ravish Kumar कुमार के प्राइम टाइम शो के बाद वरिष्ठ पत्रकारों का इसके बारे में क्या कहना है, पढ़िए…

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अभिरंजन कुमार- (एनडीटीवी के पूर्व पत्रकार ) एक विचारक के तौर पर हमारे कुछ भी विचार हो सकते हैं, लेकिन एक पत्रकार-संपादक के तौर पर हम किसी एक विचार का पिट्ठू कैसे हो सकते हैं भाई? अभी मैं देख रहा हूं कि कुछ चैनल हैं जो एक विचार की अंधभक्ति कर रहे हैं और कुछ चैनल हैं जो दूसरे विचार की अंधभक्ति कर रहे हैं। और मेरे हिसाब से वे दोनों गलत हैं।

 अमिताभ श्रीवास्तव- (आजतक के पूर्व पत्रकार)– शानदार। बेजोड़। काबिले तारीफ है एनडीटीवी इंडिया का ये अनूठा प्रयोग। बड़ा हौसला चाहिये आज के शोरगुल, चीख चिल्लाहट,गाली गलौज वाले माहौल में इस तरह भीड़ से अलग खड़ा होने के लिए। ये आत्मचिंतन मीडिया, खास तौर पर टीवी चैनलों के लिए इस वक्त बहुत ज़रूरी है।
बधाई रवीश और उनकी टीम को, संस्थान के प्रबंधन को भी इस पहल के लिए।

ओम थानवी- (पर्व संपादक, जनसत्ता)– टीवी चैनलों ने जेएनयू की आग भड़काई, उसे हवा दी। भाजपा/सरकार को कई पापों से आँख चुराने का सामान मिल गया। क्या यह किसी मिलीभगत में खड़ा हुआ षडयंत्र था। क्या चैनल राजनीतिक प्रोपगैंडा का मोहरा बन रहे हैं? पता नहीं सचाई क्या है, पर टीवी चैनलों ने ही बाद में घालमेल वाले उन वीडियो टुकड़ों की पोल खोली है जिनके सहारे जेएनयू को घेरने की कोशिश की गई।

आज एनडीटीवी-इंडिया पर रवीश कुमार ने अपने कार्यक्रम का परदा प्रतिरोध और क्षोभ में काला कर दिया। सिर्फ आवाज से विरोध और तिरस्कार का स्वर बुलंदकिया। अंत में चेहरा सामने आया तो रुआंसा था। इमरजेंसी की टीस मेरे जेहन में फिर उभर आई।

पत्रकारों के संगठन क्या कर रहे हैं? एनबीए, एडिटर्स गिल्ड क्या शुतुरमुर्ग हो गए? फरजी वीडियो दिखाने वालों ने झट से उन्हें दिखाना बंद कर दिया था, जब उनकी पोल टीवी पर ही खुल गई। लेकिन अगर वे किसी षड़यंत्र में खुद शरीक नहीं थे, या किसी झांसे में आ गए थे, तो इसकी सफाई उन्होंने पेश क्यों नहीं की, खेद क्यों प्रकट नहीं किया? … दाल में बहुत काला है।

शंभुनाथ शुक्ला (पूर्व कार्यकारी संपादक, अमर उजाला)– मैने चैनल नहीं बदला रवीश जी। आज की मीडिया की हकीकत को नए और अभिनव अंदाज से दिखाने के लिए Ravish Kumar आपको बधाई और शुक्रिया। शायद विजुअल पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा प्रयोग पहली बार हुआ। इसके पहले एक बार 27 जून 1975 को कई अखबारों ने अपने पेज काले ही छोड़ दिए थे।

राहुल देव (वरिष्ठ पत्रकार)– देश के गर्माते माहौल, उसमें मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से आग्रह- संपादकों की बैठक बुला कर चर्चा करें।

यह ज़रूरी है कि सभी, या अधिकांश, चैनल व अख़बार समय की नज़ाकत देखते हुए एक आचार संहिता पर सहमत हों, पालन करें। माहौल शांत, सकारात्मक बनाएं।

किसी चैनल/पत्रकार के बहिष्कार से असहमत। जिन्हें जिनपर आपत्ति है फ़ोन, ईमेल, ट्विटर, फ़ेसबुक पर शालीन ढंग से दर्ज कराएँ। गंदगी न फैलाएँ। (Indiatrendingnow)

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