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किसान कर्ज माफी को लेकर पिछले 13 दिनों से पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भूख हड़ताल पर बैठे हुए है तो दूसरी और आरटीआई में  कृषि लोन के नाम पर घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ है।

रिजर्व बैंक के मुताबिक नरेंद्र मोदी की सरकार में सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने साल 2016 में कुल 615 खातों में कुल 58 हजार 561 करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर लोन ट्रांसफर किया। यानी औसतन हरेक खाताधारक को लगभग 95 करोड़ रुपये का कृषि लोन मिला है। ऐसे में स्पष्ट है कि ये लोन किसी किसान के खाते में तो नहीं जमा किया गया होगा।

वायर की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2014-15 में 8.5 लाख करोड़ रुपये कृषि लोन देने की घोषणा की थी। वहीं, वित्त वर्ष 2018-19 में इसे बढ़ाकर 11 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। हालांकि आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि कृषि लोन का एक भारी हिस्सा मोटे लोन के रूप में कुछ चुनिंदा लोगों को दिया जा रहा है।

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कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों के नाम पर यह लोन एग्री-बिजनेस कंपनियों और इंडस्ट्री सेक्टर को दिया जा रहा है। आरटीआई के जरिए द वायर को मिले आरबीआई के आंकड़ों के हिसाब से सरकारी बैंकों द्वारा साल 2016 में 78,322 खातों में जो कि कृषि लोन पाने वाले कुल खातों का 0.15 फीसदी है, एक लाख 23 हजार करोड़ (12,34,81,89,70,000) रुपये डाले गए थे। ये राशि कुल दिए गए कृषि लोन का 18.10 फीसदी है।

साल 12,89,351 खातों में, जो कि कृषि लोन पाने वाले कुल खातों का 2.57 फीसदी है, दो लाख 15 हजार करोड़ (21,54,14,51,60,000) डाले गए हैं। ये राशि कुल दिए गए कृषि लोन का 18.10 फीसदी है। साल 2016 में सरकारी बैंकों द्वारा पांच करोड़ से ज्यादा खातों में छह लाख 82 हजार करोड़ (68,21,47,93,12,000) रुपये का लोन दिया गया था।

आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 से पहले भी कृषि लोन के नाम पर बड़ी मात्रा में लोगों को कर्ज दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में मात्र 604 खातों में 52 हजार 143 करोड़ का लोन दिया गया जो कि हरेक खाते में 86.33 करोड़ रुपये हुआ। मोदी सरकार से पहले यूपीए सरकार में भी यही सिलसिला जारी था। साल 2014 में भी 659 खातों में 91.28 करोड़ के हिसाब से कुल 60 हजार 156 करोड़ रुपये का कृषि लोन दिया गया।

आंकड़े बताते हैं कि यह खेल पुराना है जो साल दर साल बढ़ता जा रहा है। साल 2007 में जहां कुल 464 किसानों को प्रति खाते 74.7 करोड़ रुपये का कुल 43 हजार 664 करोड़ रुपये का कृषि लोन बांटा गया था जो नौ साल बाद 2016 में बढ़कर प्रति किसान 95.2 करोड़ और कुल रकम करीब 59000 करोड़ हो गया। यानी औसतन हर साल करीब डेढ़ हजार करोड़ का लोन बढ़ता गया जबकि देश में किसानों की दशा सुधरती हुई नहीं दिख रही है।

इस बारे में  एक कंपनी के संस्थापक किरन कुमार विसा ने कहा कि आजकल कई कृषि कंपनियां कृषि लोन ही ले रही है। रिलायंस फ्रेश जैसी कंपनियां एग्री बिजनेस कंपनी के दायरे में आती है। ये कंपनी वो है जो कृषि उत्पाद खरीदने बेचने के काम करती है और ये गोदाम बनाने के लिए कृषि ऋण श्रेणी का लोन लेती है।

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