सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है जिसमें एक नाबालिग मुस्लिम लड़की के निकाह को हाई कोर्ट ने शून्य घोषित कर दिया है। लड़की ने  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

याचिका में नाबालिग मुस्लिम लड़की ने कहा है कि उसने मुस्लिम कानून के हिसाब से निकाह किया है। वह प्यूबर्टी (रजस्वला) की उम्र पा चुकी है और अपनी जिंदगी जीने को आजाद है। हाई कोर्ट ने लड़की की शादी को शून्य करार देते हुए उसे शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया था। पीठ ने लड़की की दलीलों को सुनने के बाद इस पर विचार के लिए सहमति व्यक्त करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।

लड़की ने अपने वकील दुष्यंत पाराशर के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि हाई कोर्ट इस तथ्य की सराहना करने में विफल रहा कि उसका निकाह मुस्लिम कानून के अनुसार हुआ है। याचिका में लड़की ने अपने जीने और स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने का अनुरोध करते हुये दलील दी है कि वह एक युवक से प्रेम करती है और इस साल जून में मुस्लिम कानून के अनुसार उनका निकाह हो चुका है।

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लड़की के पिता ने पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में कहा कि एक युवक और उसके साथियों ने उसकी बेटी का अपहरण कर लिया है। हालांकि, लड़की ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए अपने बयान में कहा है कि उसने एक व्यक्ति से अपनी मर्जी से शादी की है और वह उसके ही साथ रहना चाहती है।

बता दें कि यूपी की बहराइच की एक अदालत ने 24 जून को अपने फैसले में कहा था कि लड़की की शादी की उम्र नहीं हुई है। कोर्ट ने लड़की को 18 साल की उम्र पूरी करने तक बाल कल्याण कमिटी, बहराइच के पास भेज दिया था। बाद में लड़की के पति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका दाखिल की थी।

बेंच ने लड़की के पति की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि जूवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रॉटेक्शन) ऐक्ट के तहत लड़की को नाबालिग माना जाएगा और यह शादी अमान्य है। हाई कोर्ट निचली अदालत के फैसले से सहमति जताते हुए लड़की को वूमन शेल्टर होम भेज दिया था।

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