नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर पहली समीक्षा याचिका में कहा गया है कि अयोध्या में विवादित भूमि पर बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के लिए हिंदुओं को पुरस्कृत करने के जैसा है।

मूल अयोध्या भूमि विवाद के वकील एम सिद्दीक के कानूनी वारिस मौलाना सैयद अशद रशीदी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका में दावा किया गया है कि शीर्ष अदालत द्वारा 9 नवंबर का फैसला गंभीर त्रुटियों से ग्रस्त है, इसके पुनर्विचार की आवश्यकता है।

रशीदी ने अपनी याचिका में कहा है कि ‘पूरा न्याय तभी हो सकता है, जब सुप्रीम कोर्ट केंद्र और यूपी सरकार को बाबरी मस्जिद दोबारा बनवाने का निर्देश दे।’ एडवोकेट एजाज मकबूल के जरिए दाखिल की गई इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि कोर्ट का यह फैसला ”दरअसल अदालत की ओर से दिया गया वो परम आदेश साबित हुआ जिसमें बाबरी मस्जिद को तोड़ने और राम मंदिर को उस जगह पर बनाने की इजाजत दी गई।”

इस आरोप में पक्ष में दलील दी गई कि ”क्योंकि अगर बाबरी मस्जिद को अगर गैरकानूनी ढंग से 6 दिसंबर 1992 को नहीं गिराया जाता तो वर्तमान आदेश को लागू करने के लिए उपस्थित मस्जिद को तोड़ने की जरूरत पड़ती ताकि प्रस्तावित मंदिर के लिए जगह खाली की जा सके।” याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पक्षों ने पांच एकड़ जमीन के लिए कोई दरख्वास्त या मिन्नत नहीं की थी।

उधर, मौलाना सैयद अरशद मदनी ने यह दावा किया कि अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय का फैसला ‘बहुसंख्यकवाद और भीड़तंत्र’ को न्यायसंगत ठहराता है। साथ ही कहा कि इस मामले में संविधान में दिए गए अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष अदालत में पुर्निवचार याचिका दायर की गई है न कि इसका मकसद देश के ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ में बाधा डालना है। मदनी ने कहा कि अगर उच्चतम न्यायालय अयोध्या मामले पर दिए गए अपने फैसले को बरकरार रखता है तो मुस्लिम संगठन उसे मानेगा।

Loading...
लड़के/लड़कियों के फोटो देखकर पसंद करें फिर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें

 

विज्ञापन