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नई दिल्ली – पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पंचतत्व में विलीन हो गए हैं। अब उनसे जुड़ी यादें ही बची हैं।वाजपेयी को बीजेपी का सबसे उदार चेहरा माना जाता है तो दूसरी और उनके आलोचक उन्हे आरएसएस का ऐसा ‘मुखौटा’ बताते रहे हैं, जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिन्दुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती थी।

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना में वाजपेयी भी बराबर शामिल थे। जिसके चलते दुनिया भर में भारत को शर्मसार होना पड़ा था। हालांकि उन्होने साथ ही इसकी निंदा की भी की थी।अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत-पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक किस्सा इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश रहे मार्केंड्य काट्जू ने भी साझा किया है। मार्केंड्य काट्जू ने फेसबूक पर लिखा, ‘मेरी कभी अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात नहीं हुई थी, लेकिन मैं वह किस्सा सुनाना चाहता हूं जब अटल जी मेरे समर्थन में आगे आए थे। जब यह घटना हुई उस समय मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट का जस्टिस था. उस वक्त भाजपा केंद्र और यूपी, दोनों ही जगह सत्ता में थी। अटल जी प्रधानमंत्री थे और ‘लौह पुरुष’ उप प्रधानमंत्री थे।’

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काटजू ने एक मुकदमे का जिक्र करते हुए लिखा, ‘मोहम्मद शरीफ सैफी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1998 का मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में मेरे सामने आया। इसमें याचिका दायर करने वाले मुसलमान थे, जिनकी शिकायत थी कि उन्हें उनकी खुद की ही ज़मीन पर मस्जिद नहीं बनाने दी जा रही है। बहुत से मुसलमानों की शिकायत थी कि जुमे (शुक्रवार) की नमाज उन्हें सड़कों पर बैठकर करनी पड़ती है, क्योंकि उन्हें मस्जिद बनाने की इजाजत नहीं दी जा रही है।

उस समय यूपी सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि मस्जिद के बनाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट से कोई इजाजत नहीं मिली थी। हमने 28 जनवरी 1999 को अपना फैसला सुनाया। फैसले में कहा गया कि यह आजाद, लोकतांत्रिक और सेकुलर देश है और इसलिए मुसलमानों के पास अपनी जमीन पर मस्जिद बनाने का पूरा अधिकार है या फिर अगर कोई इजाजत देता है तो उसकी जमीन पर भी मस्जिद बनाने का पूरा हक है। इसके लिए जिलाधिकारी की इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं है।

काट्जू के मुताबिक इस फैसले से पूरे राज्य में आक्रोश फैल गया। मुझे बाद में यह खबर मिली कि ‘लौह पुरुष’ (लालकृष्ण आडवाणी) इस फैसले से नाराज़ हैं और उनका कहना है कि मुझे इलाहाबाद हाईकोर्ट से हटाकर सिक्किम या फिर किसी दूसरे रिमोट स्थान पर भेज दिया जाए, लेकिन फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी मेरे बचाव में आगे आए। उन्होंने कहा कि भले ही कोई आदमी अदालत के फैसले से असहमत रहे, लेकिन हर किसी को न्यायपालिका की आजादी का सम्मान करना होगा।

काट्जू ने बताया कि इलाहाबाद में अटल बिहारी वाजपेयी जी के एक ज्योतिष भी थे, जिनका सरनेम भी वाजपेयी ही था और जिन्हें मैं जानता था। अटलजी ने ज्योतिष को फोन किया और मेरे बारे में जानकारी ली। ज्योतिष ने मेरे पक्ष में बात कही और यह बात अटलजी के दिमाग में बैठ गई और फिर उन्होंने इस मामले में कोई कार्रावाई नहीं की। मैं इलाहाबाद में ही रहा, इस कहानी के बारे में मुझे ज्योतिष ने ही बाद में बताया, कुछ सालों पहले ही उनका निधन हुआ है।

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