बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिराए जाने के 27 साल पूरे होने के मौके पर देश के 46 रिटायर्ड नौकरशाहों ने एक पत्र जारी करके देश की मौजूदा स्थिति पर अफसोस और गहरी चिंता जताई है। आज देश के अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक बन गए हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों के कंस्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (सीसीजी) ने देश के नागरिकों को जारी इस पत्र में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर अपने फैसले में उसी पक्ष को पुरस्कृत किया है जो 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेदार थे।

अपने संदेश में नौकरशाहों ने कहा कि हम भारतीय संविधान के मूल्यों और भरोसे को लेकर प्रतिबद्ध हैं। हम आपसे अपने बहुत दुख और गंभीर चितां को साझा करना चाहते हैं कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिराए जाने के 27 साल बाद, आज देश कहां खड़ा है।

हम 6 दिसंबर को बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के रूप में भी याद करते हैं जिन्होंने दुनिया के बेहतरीन संविधान का निर्माण किया। अयोध्या में उस जमीन का विवाद था जहां मध्यकालीन मस्जिद थी। यह संविधान के उच्च मूल्यों की लड़ाई थी।

पत्र में कहा गया है कि एक छोटे कस्बे में यह सिर्फ जमीन के छोटे से टुकड़े के लिए विवाद नहीं है और यह मध्यकालीन मस्जिद के स्थान पर अभी तक काल्पनिक भव्य मंदिर बनाने का भी कोई मसला नहीं है, बल्कि यह देश के सामने ऐसा विवाद है जिससे तय होगा कि क्या भविष्य में यह देश विभिन्न पहचान और विश्वास वाले लोगों का होगा या नहीं।

आज से 27 साल पहले मस्जिद गिराए जाने पर अफसोस जताते हुए पूर्व नौकरशाहों ने कहा है कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों को रोजाना सुनवाई करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अभी तक सजा नहीं मिली है। यही नहीं, उस समय विध्वंस में शामिल रहे कई लोग आज देश के शीर्ष पदों पर आसीन हैं। पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा है कि देश के मौजूदा हालात में अल्पसंख्यकों को यह संदेश मिल रहा है कि वे दोयम दर्जे के नागरिक हैं और उनके अधिकार भी कम हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद करते हुए पत्र में कहा गया है कि उनकी हत्या से दो सप्ताह पहले उन्होंने तीन मांगों को लेकर उपवास किया था। इनमें से एक मांग थी कि दिल्ली में मस्जिद और दरगाहों में रखी हिंदू मूर्तियों को तुरंत हटाया जाए और धार्मिक स्थल मुस्लिमों को लौटाए जाएं।

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