Sunday, August 1, 2021

 

 

 

अयोध्या केस में बोला मुस्लिम पक्ष – भगवान राम का ही नहीं अल्लाह का भी हो सम्मान

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अयोध्या केस में 29वें दिन भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि 1528 में पौने पांच सौ साल पहले मस्जिद बनाई गई थी और 22 दिसंबर 1949 तक लगातार नमाज हुई। तब तक वहां अंदर कोई मूर्ति नहीं थी। एक बार मस्जिद हो गई तो हमेशा मस्जिद ही रहेगी।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, वकील राजीव धवन ने हाइकोर्ट के जस्टिस खान और अग्रवाल के फैसलों के अंश के हवाले से मुस्लिम पक्ष के कब्जे की बात कही। उन्होंने कहा कि बाहरी अहाते पर ही उनका अधिकार था। लगातार और खास तौर पर कब्जे का कोई प्रूफ नहीं है, जबकि जस्टिस शर्मा ने हिन्दू पक्षकारों के अधिकार और पूजा की बात स्वीकारी है। हालांकि दोनों पक्षकारों के पास 1885 से पुराने राजस्व रिकॉर्ड भी नहीं हैं।

राजीव धवन ने अपनी दलील में यह भी कहा कि औरंगजेब ने कई मंदिरों के लिए अनुदान भी दिए थे। नाथद्वारा मंदिर के बारे में भी यही मान्यता है। इसके मौखिक और लिखित प्रमाण भी हैं।बड़ी तादाद में लोग अगर किसी मंदिर में दर्शन पूजन करते हैं तो ये कोई आधार नहीं है उसके ज्यूरिस्टिक पर्सन होने का।

इससे पहले उन्होने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि भगवान राम का सम्मान होना चाहिए, लेकिन भारत जैसे देश में अल्लाह का भी सम्मान है। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, धवन ने बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘हम मान लेते हैं कि राम का जन्म वहां हुआ। पर हिंदू पक्ष चाहता है कि वहां सिर्फ मंदिर रहे। शक नहीं कि भगवान राम का सम्मान होना चाहिए, लेकिन भारत जैसे महान देश में अल्लाह का भी सम्मान है। इसी बुनियाद पर देश बना है।’

राजीव धवन ने दलील देते हुए कहा, “रामलला विराजमान के नाम पर सूट दाखिल करने का मकसद निर्मोही अखाड़े से उसका सेवा का अधिकार (शेबैत) छीनकर, उसपर खुद का दावा और वहां नए सिरे से मंदिर बनाकर सबकुछ अपने कब्जे में लेना है।” राजीव धवन ने हिंदू पक्ष के द्वारा परिक्रमा के संबंध में गवाहों द्वारा दी गई गवाहियां कोर्ट के सामने रखीं। धवन ने कहा कि परिक्रमा के बारे में सभी गवाहों ने अलग-अलग बात कही है। उनकी गवाही में विसंगति है।

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