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नई दिल्ली | नोट बंदी हुए आज 51 दिन हो चुके है. कल पुराने नोट बैंक में जमा कराने का आखिरी दिन है. पिछले 51 दिनों से जो जो परेशानिया देश की जनता को झेलनी पड़ी उसके पीछे बड़ा ही व्यापक कारण है. कहा गया की नोट बंदी करने से देश में मौजूद कालाधन , आतंकवाद और नकली नोट खत्म हो जायेंगे. लोगो ने भारी परेशानी सहते हुए इस मुहीम का साथ दिया क्योकि यह एक बेहतर मकसद के लिए लागु की गयी.

हालांकि समय समय पर मोदी सरकार अपने बयान बदलती रही और लोगो को नयी नयी वजह बतायी जाने लगी. अब मोदी सरकार नोट बंदी को कैश लेस इकॉनमी के साथ जोड़ रही है. सरकार का कहना है की नोट बंदी देश को कैश लेस अर्थव्यवस्था की और ले जाने का पहला कदम है. बार बार बयान बदलने, बार बार मकसद बदलने की वजह से एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने आरबीआई से नोट बंदी का असली मकसद पूछ डाला.

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एक आरटीआई में पुछा गया की नोट बंदी के पीछे की क्या वजह थी और चलन से बाहर किये नोटों के बदले में नयी करेंसी कब तक बाजार में आ जाएगी. लेकिन आरबीआई ने दोनों ही सवालों का जवाब देने से मना कर दिया. आरबीआई का कहना है की आरटीआई एक्ट की धारा 2(f) के तहत किसी ऐसी आरटीआई का जवाब नही दिया जा सकता जिसकी प्रक्रति भविष्य की तारीख को जानना हो. इसलिए कब तक नया पैसा बाजार में लौटेगा इसका जवाब आरबीआई नहीं दे सकता.

वही नोट बंदी के पीछे की वजह को भी इसलिए नही बताया गया क्योकि आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(a) के तहत इसका भी जवाब नही दिया जा सकता. 8(1)(a) के तहत ऐसी किसी आरटीआई का जवाब नही दिया जा सकता जिससे देश की संप्रभुता और एकता, सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों, विदेशी राज्‍य के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाता है, ऐसी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. हालाँकि इसकी वजह पहले ही सरकार बता चुकी है लेकिन पता नही यह सवाल कैसे 8(1)(a) का उलंघन हो गया.

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