केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ टिप्पणी को लेकर कोर्ट ने गुरुवार कोसवाल किया कि कोर्ट को उस समय क्या करना चाहिए, जब कार्यपालिका काम न कर रही हो और सरकार की निष्क्रियता की वजह से नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा हो।

बता दें कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुए कार्यक्रम में बोलते हुए बुधवार को कानून मंत्री ने कहा था कि सरकार चलाने का काम उन लोगों पर छोड़ देना चाहिए, जिन्हें लोगों ने इसके लिए चुना है और न्यायपालिका को राज्य के तीनों अंगों के बीच कानून को अलग रखने का सम्मान करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों द्वारा शहरी बेघरों के मुद्दों पर समिति गठित करने में विफल रहने पर अनिवार्य आदेश जारी करने की अपनी सीमा का इजहार करते हुए कहा कि उसका चाबुक टूट गया है क्योंकि ऐसे सुझाव दिये गए हैं कि न्यायपालिका को शासन के क्षेत्र में दखल से बचना चाहिए।

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न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा, ‘हमें बताया गया है कि शासन सरकार के लिए है और अदालतों के लिए नहीं. अगर कोई शासन नहीं है, तो हम कुछ नहीं कर सकते।’ इससे पहले अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने आठ अगस्त को न्यायमूर्ति लोकुर की अध्यक्षता वाली एक पीठ को बताया था कि उसे जनहित याचिकाओं के मामले में कड़ी टिप्पणियों से बचना चाहिए क्योंकि इससे देश को परेशान करने वाले अन्य मुद्दों पर असर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट की कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि शहरी विकास मंत्रालय ने शहरों में सभी बेघरों को शेल्टर होम मुहैया कराने के लिए 2022 तक का लक्ष्य रखा है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस टारगेट को पूरा करना एक सपने जैसा है।

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