farmer suciding

केंद्र की मोदी सरकार के शासनकाल में किसानों की आत्महत्या दर में 42 फीसदी इजाफा हुआ हैं. वहीँ कृषि मजदूरों की आत्महत्या की दर में 31.5 फीसदी की कमी आई है. इसका खुलासा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में हुआ हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार साल 2015 में सूखे और कर्ज के कारण 12602 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की. इनमे 8007 किसान थे और 4595 कृषि मजदूर. वहीँ 2014 में कुल 12360 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी. इनमे किसानों की संख्या 5650 और कृषि मजदूरों की 6710 थी.

इस हिसाब से 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों और कृषि मजदूरों की कुल आत्महत्या में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इन आंकड़ों के अनुसार किसानों की आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं कृषि मजदूरों की आत्महत्या की दर में 31.5 फीसदी की कमी आई है.

इन मौतों में करीब 87.5 फीसदी केवल देश के सात राज्यों में हुई हैं. जिनमे सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में हुई. महाराष्ट्र में 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या की. महाराष्ट्र के बाद किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) में सामने आए.

30 दिसंबर को जारी की गई ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ नामक रिपोर्ट के अनुसार किसानों, कृषि मजदूरों की आत्महत्या के पीछे कंगाली, कर्ज और खेती से जुड़ी दिक्कतें प्रमुख वजहें रहीं. इन तीन कारणों से करीब 38.7 फीसदी किसानों ने आत्महत्या की.


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