साल 2005 के दिल्ली सीरियल ब्लास्ट मामले में करीब 12 साल जेल की सजा काटने के बाद आखिरकार 34 वर्षीय मोहम्मद रफीक शाह को रिहाई मिल गई. जेल से छूटे मोहम्मद रफीक शाह ने खुद को बेगुनाह बताते हुए कहा, ”धमाकों में मारे गए लोगों का अफसोस है, लेकिन मैं बेगुनाह हूं। चाहता हूं कि गुनहगारों को सजा मिले. जेल में रह कर मैंने उनका दर्द समझा. जेल से छूटकर लग रहा है कि नई जिंदगी मिल गई. इस्लाम खून-खराबा और बेगुनाहों को मारने की इजाजत नहीं देता.”

इसके साथ ही रफीक ने जेल के दौरान पुलिस के टार्चर की दास्तान भी सुनाई. जिसमे उन्होंने बताया कि उनके साथ जानवरों से भी बद्दतर व्यवहार किया गया. 2008 में रफीक शाह ने कोर्ट को बताया था कि उनके साथ दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पानी की जगह पेशाब और दूसरे आरोपियों के प्राईवेट पार्ट चूसने तथा सुवर से पूरा शरीर चटवाने एवं पैंट में चूहे डालने  तक का काम किया था. रफीक ने कहा यह सब उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया था.

रफीक 2005 में इस्लामिक स्टडीज में एमए कर रहा था जब पुलिस उसे कश्मीर से पकड़कर लाई. 29 अक्टूबर 2005 जिस दिन दिल्ली में ब्लास्ट हुआ रफीक अपने कक्षा में बैठा पढ़ रहा था. कश्मीर विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर अब्दुल वाहीद कुरैशी ने बकायदा अदालत को यह जानकारी दी है.

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एक अंग्रेजी अखबार की खबर के मुताबिक बम धमाकों के आरोपी को गिरफ्तार करने में नाकाम दिल्ली पुलिस ने कश्मीर पुलिस के साथ मिलकर एक एसटीएफ का गठन कर कुछ गिरफ्तारियां की थी. दुर्भाग्यवश मोहम्मद रफीक शाह भी उनमें से एक था. रफीक को दिल्ली स्थानान्तरित होने से दो दिन पहले तक एसटीएफ के एक कैम्प में यातनायें दी गई थी. गवाहों ने अपने बयान बदलते हुए स्वीकार किया कि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं था.

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