Monday, May 17, 2021

कुरआन ने दिया मुस्लिम औरतें को भी अपने पति को तलाक देने का अधिकार: केरल हाईकोर्ट

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लगभग 50 साल पुराने एक मामले में अपने ही फैसले को उलटते हुए केरल हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाएं बिना अदालती दखल के अपने पति को तलाक दे सकती हैं। जिसे खुला तलाक कहते हैं। कानूनी तौर पर यह वैध है।

साल 1972 (केसी मोयिन बनाम नफ़ीसा और अन्य) के एक फैसले पर कोर्ट ने कहा कि पवित्र क़ुरान भी महिला और पुरुष दोनों को तलाक का बराबर अधिकार देता है। कोर्ट ने डिसॉल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरेज ऐक्ट 1939 को नकारते हुए यह फैसला सुनाया।

दरअसल, इस फैसले में मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 समाप्त होने के मद्देनजर न्यायिक प्रक्रिया से इतर तलाक लेने के मुसलमान महिलाओं के अधिकार को नजरअंदाज कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य बहुत से तरीके (तल्ख-ए-तफ़विज़, ख़ुला, और मुबारत) मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध हैं, जैसा कि शरीयत अधिनियम की धारा 2 में बताया गया है।

अदालत ने कहा, “खुला तलाक का एक ऐसा रूप है जो पत्नी को पति की तरह तलाक देना का अधिकार प्रदान करता है। तलाक के एक रूप के रूप में खुला की मान्यता सीधे पवित्र कुरान से उपलब्ध है। अध्याय II छंद 228-229 में इसका जिक्र भी है।  कुरान पति और पत्नी दोनों को तलाक देने का अधिकार देता है ना कि सिर्फ एक को।”

अदालत ने कहा हे कि इसमें पति की सहमति प्राप्त हो ये जरूरी नहीं है। पत्नी को डावर वापस करने की बाध्यता निष्पक्षता के सिद्धांत पर आधारित है,जिसे मुस्लिम कुरान में देखने की आज्ञा भी है। इसके आगे अदालत ने ये भी कहा कि अगर पत्नी ने मेहर लौटाने से मन कर देती है, तो पति अदालत की तरफ अपना रुख कर सकता है।

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