शाहीन बाग में हुए विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले 12 प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने शीर्ष अदालत के 7 अक्टूबर के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जो निर्दिष्ट स्थानों के बाहर आयोजित किसी भी विरोध प्रदर्शन को गैरकानूनी बताते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत समीक्षा याचिका 5 नवंबर को अधिवक्ता कबीर दीक्षित ने दायर की। अपनी याचिका में उन्होने न्यायमूर्ति एसके कौल की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीश पीठ द्वारा दिए गए फैसले को पांच आधारों पर चुनौती दी।

रिव्यू पिटीशन में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि कोर्ट का यह निर्णय पुलिस को बगैर किसी प्रतिबंध के शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कार्रवाई के निर्णय का अधिकार देता है। इससे प्रदर्शनकारियों से बात कर समस्या सुलझाने की बजाय प्रशासन गलत उपयोग करेगा।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि लोकतंत्र में लोगों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन विरोध जताने का एकमात्र तरीका है। यह निर्णय प्रोटेस्ट के अधिकार का उल्लंघन करता है। समाज के कमजोर तबके से आने वाले लोगों को विरोध करने के अधिकार से वंचित किया जाएगा। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि विरोध-प्रदर्शन के लिए किसी विशेष क्षेत्र को चिह्नित नहीं किया गया है।

शीर्ष अदालत का फैसला दक्षिण दिल्ली के शाहीन बाग क्षेत्र में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम या सीएए के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में आया था, जो 15 दिसंबर, 2019 को शुरू हुआ और 24 मार्च को केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन के बाद समाप्त हो गया।

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