Tuesday, July 27, 2021

 

 

 

RTI में खुलासा – नेताओं के सहकारी बैंकों में नोटबंदी में जमकर जमा हुए थे नोट

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बीते 8 नवंबर 2016 की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के ऐलान के साथ ही पांच सौ और एक हजार के नोट बंद हो गए थे। जिसके चलते देश की जनता को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा था। हालांकि इस वक्त भी नेताओं ने खुद के सहकारी बैंकों में खूब पैसे जमा किए।

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार इन कोऑपरेटिव बैंकों में नोटबंदी के दौरान बड़े पैमाने पर 500 और 1000 रुपये के नोट बदले गए। नेशनल बैंक ऑफ एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंड (नाबार्ड) से आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार नोटबंदी के दौरान देश में 370 डिस्टिक सेंट्रल को ऑपरेटिव बैंकों में नोट बदले गए।

आरटीआई रिकॉर्ड्स के अनुसार, देश में 370 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (डीसीसीबी) ने 10 नवंबर से 31 दिसंबर, 2016 तक 500 रुपये और 1000 रुपये के 22,270 करोड़ रुपये के पुराने नोट्स बदले। इनमें 18.82 प्रतिशत (4,191.3 9 करोड़ रुपये) शीर्ष दस जिला सहकारी बैंकों द्वारा किया गया। इनमें से चार गुजरात गुजरात में हैं। चार महाराष्ट्र में, एक हिमाचल प्रदेश में और एक कर्नाटक में है।

745.59 करोड़ रुपये के पुराने नोट्स बदलने के साथ गुजरात के अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक सबसे टाॅप पर है। यहां के निदेशक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और अध्यक्ष बीजेपी नेता अजयभाई एच पटेल हैं। दूसरा 693.19 करोड़ रुपये के साथ, राजकोट जिला सहकारी बैंक है। इसके अध्यक्ष जयेशभाई राडियाडिया हैं। तीसरे स्थान पर पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक है, जिसके अध्यक्ष पूर्व एनसीपी विधायक रमेश थोरात हैं। इस बैंक की उपाध्यक्ष कांग्रेस नेता अर्चना गारे हैं।

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वहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे इसके निदेशकों में शामिल हैं। यहां 551.62 करोड़ रुपये के पुराने नोट बदले गए। चाैथे स्थान पर कांगरा जिला केंद्रीय सहकारी बैंक है, जहां 543.11 करोड़ रुपये बदले गए। इस बैंक के अध्यक्ष कांग्रेस नेता जगदीश सपेहिया थे, जिन्हें 9 महीने पहले निलंबित कर दिया गया। पांचवे स्थान पर सूरत जिला सहकारी बैंक है, जहां 369.85 करोड़ रुपये बदले गए। इसके अध्यक्ष भाजपा नेता नरेशभाई भिखाभाई पटेल हैं।

आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार नाबार्ड ने इन सभी 370 डिस्टिक सेंट्रल को ऑपरेटिव बैंकों में नोट बदलने वाले लगभग 3115964 लोगों के कागजों की जांच की है। ह भी जानकारी मिली है कि ज्यादातर राज्यों में इस तरह के डिस्टिक सेंट्रल को ऑपरेटिव बैंकों का नियंत्रण स्थानीय पार्टियों विशेष तौर पर सत्ता में मौजूद पार्टियों के नेताओं के हाथ में है।

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