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लेबनान में चल रहे फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन के चौथे सम्मेलन में भारत से प्रतिनिधि के तौर पर आए मशहूर गाँधीवादी कार्यकर्ता तुषार गाँधी ने भी शिरकत की। फ़िलस्तीन में इस्राइली दमन और फ़िलस्तीन की आज़ादी को लेकर उनकी राय काफ़ी स्पष्ट है। हमने उनसे फ़िलस्तीन और भारत के संबंधों के अलावा गाँधीवादी प्रयोगों और बापू के विचारों पर बात की।

प्रश्न- आप फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन के चौथे महाआयोजन में शिरकत कर रहे हैं, आपकी क्या राय है अधिवेशन के बारे में?

तुषारजी- मुझे इस बात की दिलासा है कि फ़िलस्तीन की आज़ादी के सवाल को हम क्षेत्रीय कहकर संकुचित करते रहे हैं, लेकिन यहाँ आकर इस बात को बल मिलता है कि फ़िलस्तीन का सवाल अन्तरराष्ट्रीय है। हम फ़िलस्तीन को समर्थन करते हैं और यहाँ आकर इस बात का विश्वास मिलता है कि जबकि हम फ़िलस्तीन के साथ खड़े हैं, हमें ज़रूरत पड़ी तो यह हमारे साथ खड़े होंगे। मुझे यहाँ आकर अकेलेपन का अहसास कम हो रहा है।

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प्रश्न- महात्मा गाँधी को फ़िलस्तीन को लेकर बहुत स्पष्टता थी तभी उन्होंने कहा थाकि फ़िलस्तीन फ़िलस्तीनियों के लिए है। आप क्या मानते हैं कि बापू को फ़िलस्तीन को लेकर इतनी स्पष्टता कैसे थी?

तुषारजी- दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए बापू का नज़रिया वैश्विक हो गया था। दक्षिण अफ्रीका से भारत आने  के बाद भी उनके विचारों में वैश्विकता बनी रही। वह आज़ादी की लड़ाई में भी वैश्विक समझ के तहत ही काम करते रहे। बापू की विचार प्रक्रिया सरल थी इसलिए वह समस्या को समझने के लिए पहले उसका सरलीकरण करते और फिर इस हिसाब से फ़ैसला करते। आप देखिए कि जब बापू ने कहाकि इंग्लैंड अंग्रेज़ों का है, फ्रांस फ्रेंच लोगों का और फ़िलस्तीन फ़िलस्तीनियों का, यह उनका समस्याओं को आसान नज़रिये से देखने का तरीक़ा था। इसी आधार पर गाँधीजी ने सभ्यताओं को आसानी से समझा और वह फ़िलस्तीन के समर्थक बने।

प्रश्न- क्या आप मानते हैं कि महात्मा गाँधी की फ़िलस्तीन के प्रति जो सोच थी, समय के साथ भारत के इस विचार में बदलाव आया है। इसके पीछे आप क्या वजह मानते हैं?

तुषारजी- हम अपने स्वार्थ के कारण फ़िलस्तीन सबब के लिए समझौता करते चले गए। जब भी हमारी सरकारों ने इस्राइल का समर्थन किया तो ज़रूरत का हवाला दिया। चाहे आतंकवाद से लड़ने का सवाल हो, पाकिस्तान से जूझने का प्रश्न या तकनीक की ज़रूरत की बात। आज भी हम खुले तौर पर यह नहीं कह सकते कि भारत इस्राइल का समर्थक है। हम इसे मान्यता नहीं देना चाहते लेकिन ज़रूरत का हवाला देकर संबंध भी बनाए रखते हैं। यह रिश्ता ख़ुदग़र्ज़ी का है। इस्राइल को हमसे मान्यता चाहिए। जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस्राइल के वजूद को नकार दिया तब हम क्यों इस्राइल को गले लगाने के लिए बेताब हैं? यह ज़रूरत से ज़्यादा लालच का सवाल है। फ़िलस्तीन को समर्थन के मुद्दे पर गिरावट सिर्फ़ भारत में नहीं, पश्चिम एशिया में भी देखने को मिलती है और समस्या वही है। स्वार्थ और लालच।

प्रश्न- लेबनान के इस अधिवेशन में भारत को काफ़ी तवज्जो दी गई है, आप इसके पीछे क्या कारण मानते हैं?

तुषारजी- मैं मानता हूँ कि यह रिश्ता पारम्परिक है। भारत के लोगों के दिल में फ़िलस्तीन की जगह है। मुझे लगता है कि पिछले दिनों भारत के फ़िलस्तीन समर्थन में कमी आ रही है जिसके लिए लोगों में चिन्ता है। शायद भारत के बड़े प्रतिनिधिमंडल को जगह देकर यह उस कमी को समझना चाहते हैं कि भारत के स्टैंड में कमी क्यों आ रही है। मगर यह समझने की बात है कि भारत की आम जनता अब भी फ़िलस्तीन को समर्थन देती है।

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तुषार गांधी

प्रश्न- फ़िलस्तीन और इस्लाम के रिश्ते पर आपकी क्या टिप्पणी है?

तुषारजी- मुझे लगता है कि फ़िलस्तीन के सबब का यह सबसे बड़ा नुक़सान होगा अगर आज़ादी की इस लड़ाई को सिर्फ़ इस्लाम से जोड़ दिया जाए। यह एक देश की आज़ादी की लड़ाई है। यह सवाल धर्म का नहीं, आज़ादी का है। फ़िलस्तीन को इस्लामी जगत से बाहर भी व्यापक समर्थन मिलता रहा है। फ़िलस्तीन को सिर्फ़ इस्लाम से जोड़ना ग़लत होगा। हमें समझना चाहिए कि सभी लोगों में स्वतंत्रता का मूल विचार काम करता है और आज़ादी की लड़ाई को दबाने पर कई लोग साथ आते हैं। यह मानव का स्वभाविक जज़्बा है कि वह आज़ादी की लड़ाई के साथ आपको जोड़ता है। फ़िलस्तीन के साथ यही हो रहा है। दुनिया भर में फ़िलस्तीन अनैतिक ग़ुलामी के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है और जो भी ग़ुलामी के ख़िलाफ़ है, वह फ़िलस्तीन के पक्ष में आ रहा है।

प्रश्न- फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन के आयोजन को क्या आप सफल मानते हैं?

तुषारजी- मैंने यहाँ वृत्त चित्रों में देखा कि कैसे फ़िलस्तीन के लोग दीवारों में क़ैद हैं। इस तरह के आयोजन से लोग चाहें तो बदलाव ला सकते हैं। अधिवेशन से संदेश जाएगा कि बाक़ी दुनिया फ़िलस्तीन के बारे में क्या सोचती है। यह कार्यक्रम फ़िलस्तीन की आज़ादी की लड़ाई को व्यापक संदेश देने में सफल होगा।

प्रश्न- फ़िलस्तीन और महिलाओं के संबंध काफ़ी गहरे हैं। सिर्फ़ फ़िलस्तीन की महिला ही नहीं बल्कि दुनिया में अन्य महिलाएँ भी फ़िलस्तीन के समर्थन में खड़ी दिखाई देती हैं। यह अधिवेशन इस बात का सुबूत है क्योंकि दुनिया भर की महिलाओं की यहाँ भी बड़ी भागीदारी है। आपकी क्या टिप्पणी है?

तुषारजी- इस पर मैं बहुत सरल बात कहूँगा। आप देखिए कि फ़िलस्तीन की लड़ाई घर की लड़ाई है। अपनी बस्तियों को बसाने केलिए इस्राइल फ़िलस्तीन के घर तोड़कर उन्हें बंजर बनाने में लगा है। यह दर्शाता है कि वह घरों से लड़ना चाहता है। हर घर के बनाने और बसाने के पीछे एक औरत की ज़िन्दगी होती है। औरत घर चलाने वाली ताक़त है जिस पर इस्राइल क़ब्ज़ा करना चाहता है। इस्राइल महिलाओं की मूल पहचान पर हमला कर रहा है। घर की भावना पर हमला करना औरत की पहचान पर हमला है। मैं लिंगभेद के आधार पर नहीं कह रहा हूँ लेकिन यह सच है कि महिला होम मेकर होती है और इस्राइल की ग़लती यह है कि वह औरत की दुनिया पर हमला कर रहा है। दुनिया में जब युद्ध होते हैं तो घर छोड़े जाते हैं, इस्राइल सिर्फ़ घरों पर हमला कर रहा है, उन्हें तोड़ रहा है। यह फ़िलस्तीनियों पर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की औरतों की पहचान पर हमला है। मुझे लगता है कि यही भावना दुनिया भर की महिलाओं को फ़िलस्तीन के साथ जोड़ रही है। एक पुरुष दुनिया भर में घूमता रहे, महिला को अपना घर प्यारा होता है। इस्राइल का फ़िलस्तीनियों के घरों पर हमला सिस्टरहुड के सिद्धांत पर हमला है जो दुनिया भर की महिलाओं को फ़िलस्तीन के मुद्दे पर जोड़ रहा है।

प्रश्न- जब महिलाओं की बात ही चल रही है तो आप इस्राइल की जेल में बंद किशोर फ़िलस्तीनी बच्ची अहद तमीमी पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?

तुषारजी- बिल्कुल। आप देखिए अहद तमीमी आज़ादी की लड़ाई की युवा पहचान बन गई हैं। बच्चियों की तालीम पर जो ख़याल मलाला यूसुफ़ज़ई का है, वही मुक़ाम अहद तमीमी का आज़ादी की लडाई को लेकर है। इस्राइल ने अहद तमीमी को जेल में डालकर आज़ादी की इस लड़ाई को ख़ुद ही तेज़ कर दिया है। मैं यह नहीं कह रहा कि यह सिर्फ़ इन बच्चियों की लड़ाई है लेकिन हम अपना समर्थन देकर इस लड़ाई को आवाज़ दे सकते हैं।

प्रश्न- इस्राइली दमन पर आप क्या सोचते हैं?

तुषारजी- यह बर्बर है। उतना ही बर्बर जो साल 2002 में गुजरात में हुआ जब गर्भवती महिलाओं को इसलिए मार डाला गया क्योंकि वह आने वाली नस्लों को भी मिटा देना चाहते थे। जब भी कोई बच्चों को अपने दमन का हिस्सा बनाता है, यह स्पष्ट है कि वह भविष्य को भी मिटाना चाहता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

प्रश्न- आपकी राय में फ़िलस्तीन का भविष्य क्या है?

तुषारजी- मुझे लगता है फ़िलस्तीन आज़ाद होगा, जैसे इतिहास में कभी ग़ुलामी नहीं चली और आज़ादी की हर लड़ाई अपने अंजाम तक पहुँची, यह भी पहुँचेगी। जंग का उसूल है कि वह जारी नहीं रह सकती, उसे समाप्त होना पड़ता है। प्रश्न यह है कि वह बापू के सिद्धांत के मुताबिक़ आजादी की लड़ाई सत्याग्रह पर आधारित होनी चाहिए। फ़िलस्तीनियों को न्याय मिलेगा। अहिंसा के रास्ते फ़िलस्तीन यह लड़ाई बहुत जल्द जीत जाएगा। फ़िलस्तीन के महान् नेता यासिर अराफ़ात से मिलने वाले विदेशियों में अंतिम व्यक्ति मेरे पिताजी थे। तब यासिर अराफ़ात ने उनसे कहा था कि फ़िलस्तीन को एक गाँधी चाहिए। मुझे लगता है फ़िलस्तीन आज़ाद होगा। ज़रूर होगा।

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