islamm

कारगिल: कारगिल युद्ध के बारे में दुनिया भर जानती है। इस युद्ध को 20 साल बीत चुके है। युद्ध से जुड़ी एक खास बात जो एक बड़ी मिसाल पेश करती है। दरअसल, बीते बीस सालों से यहां एक हिंदू परिवार 1.65 लाख मुस्लिमों के बीच रह रहा है। 1999 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद इस इलाके में हिंदू-मुस्लिम शांति भंग हो गई थी और तनाव फैल गया था।

रविन्द्र नाथ और उनकी पत्नी मधु एलओसी से मात्र दो सौ मीटर दूर पर होलसेल की दुकान चलाते हैं। वह दो दशकों से कारगिल के पौने दो लाख परिवारों में से इकलौता हिन्दू परिवार है क्योंकि बाकी के परिवारों ने यहां से पलायन कर दिया था।

रविंदर बताते हैं, ‘हम 45 साल से यहां रह रहे हैं। कई हिंदू परिवार यहां से बड़े शहरों की ओर जा चुके हैं लेकिन हमने महसूस किया कि यहां के लोग हमें हमारे पंजाबी दोस्तों के मुकाबले ज्यादा प्यार दे रहे हैं। हमारा ध्यान रख रहे हैं। यहां ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब हमें अकेला महसूस हुआ हो। मधु कहती हैं, ‘जब हम एलओसी में सुरक्षित रह सकते हैं तो बाकी देश क्यों नहीं?’

उन्होने बताया कि जब दिवाली मनाई जाती है तो मुस्लिम परिवार और उनके बच्चे सुबह से ही घर को सजाने जुट जाते हैं और लाइटिंग करते हैं। मधु कहती है कि यह उनका अपना घर और अपना क्षेत्र है। एलओसी है तो क्या, वे यहां पर सुरक्षित हैं। उनके अनुसार कारगिल युद्ध के दौरान थोड़ा तनाव था पर मुस्लिम, हिन्दू, सिख और बौद्ध परिवार यहां मिलकर रहते हैं।

इसके अलावा यहाँ एक इंटर रिलिजन जोड़ा भी है। यहां पर तीन सिख परिवार रहते हैं। उन्होंने गुरूद्वारा भी बनाया है और उसकी दीवार हनफिया अहल-ए-सुन्नत मसिजद के सटी हुई है जो मुस्लिमों ने बनवाई है। जसविंदर सिंह और खातिजा बानों ने 1996 में निकाह किया था। परिवार की राजमंदी न होते हुये भी दोनों ने शादी की और अब खुशी से रह रहे हैं।

जुनैद बताते हैं, ‘खातिजा अक्सर बाल्टी भरने गुरुद्वारे आती थीं। मैं उनकी तरफ आकर्षित होने लगा। मैंने उन्हें चिठ्ठियां लिखनी शुरू कीं और हमें एक-दूसरे से प्यार हो गया। मेरे पास शादी के लिए दो विकल्प थे- या तो मैं इस्लाम अपना लूं या फिर वो सिख धर्म। मैंने इस्लाम अपनाने का फैसला किया और जुनैद अख्तर हो गया। आज मैं अपनी मां और भाई के साथ बैसाखी मनाता हूं और बच्चों के साथ ईद। मैं परिवार के लिए जसविंदर हूं और बाकियों के लिए जुनैद।’

खातिजा मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘जुनैद से मैं गुरुद्वारे जाती थी और गुरबानी भी याद कर ली थी।’ वह आगे कहती हैं, ‘हम उदार ख्यालों वाले अभिवावक हैं और हमारे बच्चे किसी भी धर्म का जीवनसाथी चुनने के लिए आजाद हैं लेकिन हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच की दीवार को तोड़ने वाले लड़के-लड़कियों पर जब हमला होता है तो हम डर जाते हैं।’ यह जोड़ा जम्मू-कश्मीर के शिक्षा विभाग में कार्यरत है।

Loading...

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें