राफेल डील को लेकर मचे राजनीतिक घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से फ्रांस के साथ हुई इस डील पर जवाब मांगा। केंद्र से पूछा कि सरकार ने कैसे राफेल डील की, इसके बारे में पूरी जानकारी 29 अक्टूबर तक सीलबंद लिफाफे में दी जाए।

राफेल पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीस रंजन गोगोई, एस.के कौल और जस्टिस जोसेफ ने कहा है, सरकार बताए कि राफेल डील को फाइनल करने के लिए जो फैसले लिए गए उनकी क्या प्रक्रिया थी।  इस मामले में 31 अक्टूबर को अब अगली सुनवाई होगी।

बेंच ने कहा, ‘‘हम सरकार को कोई नोटिस जारी नहीं कर रहे हैं, हम केवल फैसला लेने की प्रक्रिया की वैधता से संतुष्ट होना चाहते हैं। अदालत को विमान की कीमत और सौदे के तकनीकी विवरणों से जुड़ी सूचनाएं नहीं चाहिए।’’ वहीं, केंद्र सरकार ने राफेल डील पर दायर की गई याचिकाओं को रद्द करने की मांग की। केंद्र ने दलील दी कि राजनीतिक फायदे के लिए राफेल पर PILs दायर की गई हैं।

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अटर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा कि राफेल सौदा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और ऐसे मुद्दों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है। वहीं, कांग्रेस नेता और आरटीआई कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला ने राफेल सौदे के संबंध में दायर अपनी जनहित याचिका वापस ले ली है।

बता दें कि सितंबर 2016 में भारत-फ्रांस के बीच 36 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए डील हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सौदा 7.8 करोड़ यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपए) में फाइनल हुआ। कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है।

मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार पर राफेल डील में रिलायंस को कॉन्ट्रेक्ट दिलाने और इस डील में करोड़ों के हेरफेर किया है।

मामले ने उस वक्त जोर पकड़ लिया जब पिछले दिनों फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने एक मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में कह दिया कि रिलायंस को पार्टनर बनाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प ही नहीं था। ओलांद ने कहा था कि यह एकमात्र विकल्प भारत सरकार ने प्रस्तावित किया था। नतीजतन, राफेल बनाने वाला कंपनी दसॉल्ट के पास रिलायंस को साझेदार बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

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