Reshma Shaikh (34), a resident of Bandra East, claims she was slapped by a doctor at a civic-run hospital when she was screaming in labour pain. Express
Reshma Shaikh (34), a resident of Bandra East, claims she was slapped by a doctor at a civic-run hospital when she was screaming in labour pain. Express

मुंबई के बेहरामपदा निवासी रूही फातिमा (30) ने बांद्रा पश्चिम में स्थित सरकारी अस्पताल में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया तो उन्हें उस वक्त झटका लगा जब स्त्री रोग विशेषज्ञ ने प्रसव पीड़ा के दौरान थप्पड़ मारा था. उन्होंने बताया कि उनकी निजता का कोई ख्याल ही नहीं रखा गया. साथ ही उनके साथ चुभते अशिष्ट व्यवहार किया गया.

फातिमा ने आगे कहा कि इसी तरह के व्यवहार का सामना अन्य मुस्लिम महिलाओं को भी करना पड़ा, जब उन्होंने अपने पहले बच्चें को जन्म दिया. उन्होंने बताया कि उन्हें बाद में एहसास हुआ कि ये सब मुसलमानों के प्रति आम हैं. उन्होंने इस शर्मनाक बताया.

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और दूसरे गैर-सरकारी संगठन की दो रिपोर्टो में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ इसी तरह के भेदभाव को पाया गया है. सर्च महिला अध्ययन केन्द्र, एसएनडीटी द्वारा तैयार की गई जिसमे मुंबई की मलिन बस्तियों में रहने वाली 250 मुस्लिम परिवारों और विवाहित महिलाओं का इंटरव्यू लिया गया, जिसमें से 77 फीसदी आबादी सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराते हैं. इन सभी ने इंटरव्यू में माना कि मुस्लिम होने की वजह से उनका बुरी तरह से इलाज किया गया, और उनके साथ अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया.

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रिसर्च टीम की सदस्य पारुल ने कहा कि सरकार भेदभाव नहीं करती हैं. लेकिन सेवाओं को लागू करने के लिए उनके समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह है. यह न सिर्फ अस्पताल में हैं बल्कि शैक्षिक संस्थानों में भी मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता हैं. उन्होंने आगे कहा कि मुस्लिम महिलाओं को अपने नवजात शिशुओं के पंजीकरण के दौरान सबसे अधिक अपमानित किया जाता हैं और किया जा रहा हैं. उन्हें अक्सर बच्चों की पैदाइश पर ज्यादा बच्चें पैदा करने का ताना मारा जाता हैं.

गैर सरकारी संगठन Cehat ने 85 झुग्गी बस्ती महिलाओं का इंटरव्यू लिया जिसमे 44 मुस्लिम और 41 गैर-मुस्लिमों महिलाओं को शामिल किया गया. इसमें खुलासा हुआ कि जब इन महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग करने की बात आती हैं तो “गरीब, महिला और मुस्लिमों” को एक ट्रिपल बोझ के रूप में माना जाता हैं. संगठन के अनुसार, अस्प्ताल से बच्चें की चोरी होने की घटनाओं को लेकर अस्पताल के गेट पर ही बुर्का प्रतिबंधित कर दिया गया. और इस बच्चों की चोरी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. जो कि शर्मनाक और अपमानित करने जैसा हैं.

मुन्नी, जप कि एक कुर्ला निवासी हैं, उसने अपने घर में ही अपने चौथे बच्चे को जन्म देने का फैसला किया, उसने ऐसा इसलिए किया कि वह डरी हुई थी कि उसे बीएमसी अस्पतालों में कर्मचारी ताना मारेंगे. इसके लिए उसने एक दाई को 300 रुपये का भुगतान भी किया.

सामाजिक कार्यकर्ता सुबरन घोष के मुताबिक, उन्होंने गोवंडी मलिन बस्तियों में हाल ही में एक कार्यक्रम आयोजित किया था. जिसमे उन्हें पता चला कि मुस्लिम महिलाओं को इलाज के नाम पर उन्हें सार्वजनिक अस्पतालों में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता हैं. उन्होंने कहा, “बच्चे का जन्म एक माँ के लिए सबसे भावुक क्षण है. मुसलमानों का अक्सर हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक उपहास बनाया जाता हैं.

हसीना खान, जो कि बेबाक कलेक्टिव के साथ जुडी हुई हैं उन्होंने इस मुद्दें को राज्य अल्पसंख्यक आयोग के साथ उठाया. लेकिन इस पर कोई कारवाई नहीं हुई. उन्होंने कहा कि मुस्लिम बस्तियों में सरकार की विशेष स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता ही गायब हैं. उन्होंने बताया कि मुम्बरा में कोई सरकारी अस्पताल नहीं हैं. वहां सिर्फ एक प्रसूति घर हैं. वे कहती हैं कि कई मुस्लिम महिलाओं ने इस अपमान से बचने के लिए निजी चिकित्सकों के पास जाना शुरू कर दिया है.

बांद्रा पूर्व की रहने वाली रेशमा शेख (34) ने बताया कि वे 2007 में तीसरे बच्चें की डिलीवरी के लिए बीएमसी के सरकारी अस्पताल में भर्ती हुई थी. उसने आगे बताया कि उस समय उसके चेहरे पर आंशिक पक्षाघात हो गया था. प्रसव पीड़ा के दौरान मैं दर्द की वजह से चिल्ला रही थी , और महिला डॉक्टर मेरे गाल पर मुझे थप्पड़ मारे जा रही थी. मैंने इस बारें में अपने परिवार को नहीं बताया जब तक कि मुझे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई नहीं. उसका पति एक टैक्सी ड्राइवर है. इस प्रकरण के बाद, उसने इलाज के लिए निजी क्लीनिक का दौरा किया लेकिन जल्द ही वित्त की कमी के कारण बीएमसी अस्पताल को वापस बंद कर दिया,

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के संस्थापक खातून शेख ने कहा कि “सरकारी अस्पतालों में मुस्लिम महिलाओं को लेकर आम धारणा है कि वे, कई बच्चों को जन्म देती हैं, और वे अशिक्षित हैं. साथ ही बीच्चों को चोरी करने के लिए बुर्का का इस्तेमाल करती हैं.

केईएम अस्पताल में प्रसूति विभाग के प्रोफेसर डॉ पद्मजा मवानी के मुताबिक़ डॉक्टर मरीज के रिश्ते को सुधारने के लिए संवेदीकरण की जरूरत हैं विशेषकर प्रशिक्षु डॉक्टरों में.

चिकित्सा शिक्षा के निदेशक, डॉ प्रवीण शिंगारे ने दावा किया है कि छात्र के मेडिकल पाठ्यक्रम में नैतिक प्रथाओं के जरिये इस मानसिकता को बदलने में मदद मिल सकती है.

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