हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा करके सत्ता में आई मोदी सरकार के शासन में रोजगार मिलना तो दूर बल्कि करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि पांच सालों में रोजगार में लगभग पौने पांच करोड़ की कमी आई है। मतलब नए रोजगार मिलने की बजाए कम हुए हैं।

NSSO के आंकड़े बताते हैं कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 4.3 करोड़ रोजगार कम हुए हैं, जबकि शहरों में 40 लाख रोजगार कम हुए हैं। कुल मिलाकर देश में कामगारों की संख्या में पौने पांच करोड़ की कमी आई है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2011-12 और 2017-18 के बीच ग्रामीण भारत में करीब 3.2 करोड़ कैजुअल मजदूरों ने अपनी नौकरी खो दी, जो पिछले सर्वेक्षण में 29.2 प्रतिशत थी। नौकरी गंवाने में लोगों में लगभग तीन करोड़ खेती करने वाले थे।

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NSSO द्वारा जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2017-18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के बाद से खेत में काम करने वाले लोगों की संख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जिसे सरकार ने जारी करने से मना कर दिया। कैजुअल लेबर से मतलब ऐसे लोगों से है जिन्हें अस्थाई रूप से काम रखा जाता है।

NSSO के डेटा के मुताबिक ग्रामीण कैजुअल मजदूर खंड (खेती गैर खेती) में 7.3 फीसदी पुरुष और 3.3 फीसदी महिला रोजगार में कमी आई। यह कमी 2011-12 के बाद से आई है। इन आंकड़ों के हिसाब से कुल 3.2 करोड़ रोजगार का नुकसान हुआ है। हालांकि एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2018 में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा अनुमोदित है, मगर अभी तक सरकार द्वारा जारी नहीं की गई है।

एनएससी के दो सदस्यों, जिसमें इसके कार्यवाहक अध्यक्ष पीएन मोहनन भी शामिल थे, ने रिपोर्ट को वापस लेने का विरोध करते हुए जनवरी के अंत में इस्तीफा दे दिया था। 2017-18 के एनएसएसओ सर्वेक्षण की तरह, 2011-12 के सर्वेक्षण में भी ग्रामीण महिलाओं के रोजगार का एक बड़ा नुकसान दर्ज किया गया था। 2004-05 और 2011-12 के बीच ग्रामीण रोजगार में महिलाएं 22 मिलियन से कम हो गईं। इसी अवधि में, ग्रामीण पुरुष रोजगार में 13 मिलियन की वृद्धि हुई।

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