नयी दिल्ली –  सन 2019 के लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंका जा चूका है. हाल ही में कांग्रेस ने अपने सभी कार्यकर्ताओं से आगामी चुनावों के लिए तैयार रहने को कहा है, कांग्रेस सीनियर लीडर गुलाम नबी आज़ाद ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आगाह करते हुए कहा था की अगले लोकसभा चुनाव 2018 में ही हो सकते है, इसीलिए सभी कार्यकर्ताओं को अपनी ज़िम्मेदारी खुद समझते हुए इसके लिए कमर कस लेनी चाहिए.

वहीँ दूसरी तरफ आरएसएस और भाजपा ने भी तैयारियां जोरो पर शुरू कर दी हैं, 2014 में अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर बनवाने का वादा किया था लेकिन चुनाव को बीते चार साल हो चुके है और मामला जगजाहिर है इसीलिए चुनावों की आहट होते ही शायद भाजपा इस बार फिर से अपने पारंपरिक मुद्दे की तरफ रुझान करती हुई नज़र आ रही है.

सिर्फ भाजपा ही नही बल्कि आरएसएस ने भी राम मंदिर को लेकर सरगर्मियां शुरू कर दी है, आरएसएस इस मुद्दे को लेकर सुन्नी मुसलिम समुदाय को साथ लेने की फिराक में है. उनका मानना है की राममंदिर बनवाने के लिए सुन्नी समुदाय अधिक विरोधी है जबकि शिया समुदाय का रवैया उनके समर्थन में है.

एनबीटी की खबर के मुताबिक संघ के रिसर्च विंग का मानना है की सुन्नी समुदाय लगातार राम मंदिर का विरोध करता है जबकि शिया समुदाय से अधिकाँश उनके समर्थन में है इसीलिए वो सुन्नी समुदाय को साथ लाने की कोशिश करेंगे, जिससे की राम मंदिर का निर्माण शुरू किया जा सके.

आरएसएस की यह सोच शायद शिया वक्क बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी के पिछले बयानों के आधार पर है. जिन्होंने गुरुवार को संघ प्रचारक इन्द्रेश से मुलाकात की थी. वसीम रिज़वी जो पिछले पखवाड़े से राम मंदिर को लेकर अपना समर्थन जगजाहिर कर चुके है लेकिन कमाल की बात यह है की खुद को शिया समुदाय का पैरोकार बताने वाले वसीम रिज़वी का खुद शिया समुदाय ही बायकाट कर रहा है.

ऐसे में आरएसएस का यह मानना की शिया समुदाय का एक बड़ा तबका राममंदिर का समर्थन करता है, शायद जल्दबाजी होगी.

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