Saturday, December 4, 2021

कठुआ रेप केस में निष्पक्ष सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

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जम्मू के कठुआ जिले के रासना गाँव में मंदिर में आठ साल की मासूम के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई को लेकर चिंता जाहिर की है.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर एवं न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई की संभावना में जरा भी कमी नजर आने पर हम मामले की सुनवाई कठुआ से बाहर स्थानांतरित कर देंगे.

पीठ ने कहा कि सुनवाई ना सिर्फ आरोपी बल्कि पीड़ित परिवार के लिये भी निष्पक्ष होनी चाहिए तथा उनकी एवं उनके वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए. कोर्ट इस मामले में अब 30 जुलाई को आगे सुनवाई करेगा.

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कठुआ रेप मामले के विरोध में प्रदर्शन करते लोग

वकीलों द्वारा क्राइम ब्रांच को चार्जशीट दाखिल करने से रोकने के मामले में न्यायालय ने कहा कि अगर वे गलत पाये जाते हैं तो उनके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जायेगी.

बता दें कि मामले की सुनवाई शुरू होते ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने सीलबंद लिफाफे में कठुआ में इस मामले में वकीलों द्वारा कथित बाधा डालने से संबंधित अपनी जांच रिपोर्ट पीठ को सौंपी.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि वकीलों के संगठन ने न तो संबंधित अदालत में आरोप पत्र दाखिल करने के जम्मू कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा के काम में बाधा डाली. और न ही पीड़ित परिवार की वकील दीपिका सिंह राजावत को उच्च न्यायालय में पेश होने से रोका.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय बार एसोसिशन, जम्मू और कठुआ जिला बार एसोसिएशन के सारे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग न्यायोचित लगती है.

इस बीच राज्य सरकार के वकील शोएब आलम ने इस रिपोर्ट का विरोध किया और फिर कहा कि वकीलों की पुलिस दल के साथ कथित रूप से धक्का मुक्की हुई थी. जिसकी वजह से वह अदालत में आरोप पत्र दाखिल नहीं कर सकी थीं.

आलम ने कहा कि इस रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता. क्योंकि कठुआ में आंदोलित वकीलों द्वारा कथित रूप से बाधा डालने के शिकार हुए अपराधा शाखा के किसी भी अधिकारी का पक्ष सुना नहीं गया.

उन्होंने उच्च न्यायालय की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कठुआ के जिला न्यायाधीश की अलग रिपोर्ट की ओर ध्यान आकर्षित किया. उन्होंने दावा किया कि इस रिपोर्ट में अधिकारियों को रोके जाने और न्याय प्रशासन में बाधा डाले जाने के बारे में स्पष्ट निष्कर्ष निकाले गये हैं.

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