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भारत के इतिहास में पहली बार कोई एतिहासिक इमारत किसी कॉरपोरेट घराने के हाथों में गई हो. केंद्र की मोदी सरकार ने मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा बनवाए गए दिल्‍ली स्थित लाल किले को पांच वर्षों के लिए डालमिया भारत ग्रुप को सोपं दिया है.

डालमिया ग्रुप ने नरेंद्र मोदी सरकार की ‘अडॉप्‍ट ए हेरिटेज’ नीति के तहत इसे गोद लिया है. पांच साल के कांट्रैक्‍ट पर ऐतिहासिक इमारत को गोद लिया गया है. ये कांट्रैक्‍ट 25 करोड़ की कीमत पर हुआ है.

इस मामले में बड़ा खुलासा हुआ है. सांस्कृतिक मंत्रालय के 2013 के आकड़ों के अनुसार, लाल किले से 2013-14 में 6 करोड़ 15 लाख 89 हज़ार 750 रुपये की कमाई की थी. ऐसे में अगर औसत 6 करोड़ रूपये लाल किले से आमदनी मानी जाए तो ये 5 साल की 30 करोड़ होगी.

ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि सरकार से सिर्फ 25 करोड़ रुपये के समझौते में आखिर क्यों लाल किले को पांच साल के लिए गोद दे दिया. जब सरकार को पहले से ही ज्यादा आमदनी हो रही तो फिर कम कीमत पर निजी कंपनी के हाथ में ईमारत को सोपने की क्या वजह है.

इस मामले में राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा इसे लाल किले का निजीकरण करना कहोगे, गिरवी रखना कहोगे या बेचना.अब पीएम का स्वतंत्रता दिवस का भाषण भी निजी कंपनी के स्वामित्व वाले मंच से होगा. ठोको ताली. जयकारा भारत माता का!

वहीँ तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, ‘‘क्या सरकार हमारे ऐतिहासिक लालकिले की देखभाल भी नहीं कर सकती? लालकिला हमारे राष्ट्र का प्रतीक है. यह ऐसी जगह है जहां स्वतंत्रता दिवस पर भारत का झंडा फहराया जाता है. इसे क्यों लीज पर दिया जाना चाहिए? हमारे इतिहास में निराशा और काला दिन है.’’

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