निचली अदालत द्वारा हत्या के दोषी को 10 साल कैद की सजा सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि हत्या के मामले में दोषी पाए जाने पर या तो केवल उम्रकैद की सजा हो सकती है या फिर फांसी.

देश की सर्व्वोच अदालत ने कहा कि हत्या मामले में उम्रकैद की सजा से कम सजा देना गैर कानूनी है और कानून के दायरे से बाहर है. कोर्ट ने कहा कि उम्रकैद और फांसी के अलावा किसी और सज़ा का प्रावधान भी नहीं है.

बता दें कि गुजरात के मेहसाना में दिलीप नामक शख्स की हत्या के मामले में भरत कुमार नामक शख्स को निचली अदालत ने दोषी करार दिया.  मेहसाना के अडिशनल सेशन जज ने भरत कुमार नामक शख्स को हत्या मामले में दोषी करार देते हुए 10 साल कैद की सजा सुनाई.

गुजरात सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी और सजा बढ़ाने की अपील की. गुजरात हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2015 को दोषी भरत कुमार की सजा हत्या मामले में उम्रकैद कर दी. हाई कोर्ट के फैसले को आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात हाई कोर्ट ने उम्रकैद की जो सजा दी है उससे हम सहमत हैं. लेकिन साथ ही कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि कैसे सेशन कोर्ट ने हत्या मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के बाद सिर्फ 10 साल कैद की सजा सुनाई.

एक बार जब आरोपी आईपीसी की धारा-302 यानी हत्या में दोषी ठहराया जाता है उसके बाद या तो फांसी की सजा हो सकती है या फिर उम्रकैद की. उम्रकैद से कम सजा देना अवैध और कानून के दायरे से बाहर की बात है.

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