बीते चार महीने से लापता जेएनयू छात्र नजीब अहमद के मामलें में हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कोई सुराग न मिल पाने की वजह से संबंधित लोगों का पॉलीग्राफ परीक्षण कराने जैसी अन्य तरकीबों की संभावना तलाशने को कहा है. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि अगर जांच में पुलिस को कुछ खास नहीं मिल पा रहा है तो वो पॉलीग्राफ टेस्ट करा सकती है. मामला गंभीर है इसलिए हर उस शख्स को खंगाला जाए जो मामले पर रोशनी डाल सकता है.

न्यायमूर्ति जीएस सिस्तानी व न्यायमूर्ति विनोद गोयल के पीठ ने कहा कि छात्र बीते साल अक्तूबर में लापता हुआ था और अब फरवरी आ चुका है. लगभग चार महीने हो गए लेकिन किसी भी सुराग का कोई परिणाम नहीं निकला है. हमने पॉलीग्राफ परीक्षण के लिए कहा है क्योंकि अन्य तरकीबों का कोई परिणाम नहीं निकला है.

हाइकोर्ट मामले में संदिग्ध 9 छात्रों में से एक की याचिका पर सुनवाई कर रहा है. छात्र ने दिल्ली पुलिस के उसे पॉलीग्राफी टेस्ट के लिए किए गए नोटिस को चुनौती देने के अलावा हाई कोर्ट को अपने 14 दिसंबर और 22 दिसंबर के आदेश पर पुर्नविचार करने का आग्रह किया है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि हाई कोर्ट के ये दोनों आदेश मामले की जांच को नियंत्रित कर रहे है, जो उनके अधिकारों के खिलाफ है.

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पीठ ने यह भी साफ किया कि अदालत जांच की निगरानी नहीं कर रही है, जैसी कि छात्रों ने आशंका जताई है. वह नजीब का पता लगाने के लिए सिर्फ परामर्श दे रही है. पीठ ने अधिवक्ता से कहा कि यदि छात्र लाई-डिटेक्टर परीक्षण नहीं चाहता तो वह इससे इनकार कर सकता है. लेकिन मौजूदा मामले में छात्रों को स्वयं आगे आकर और जांच में शामिल होकर पुलिस की मदद करनी चाहिए.

पीठ ने कहा कि पुलिस नजीब के लापता होने के महीनों बाद भी छात्रों को थाने लेकर नहीं गई, जो कि आम तौर पर होता नहीं है. इस तरह क्या हम उस पर आवश्यकता से अधिक या आवश्यकता से कम प्रतिक्रिया का आरोप लगा सकते हैं. इसने पूछा, यदि लापता छात्र के कमरे में रहने वाले छात्र के लाई डिटेक्टर परीक्षण के लिए कहा जा सकता है तो उन छात्रों से क्यों नहीं जिनसे उसका (नजीब का) झगड़ा हुआ था.

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