babri masjid

बाबरी मस्जिद की शहादत देश के माथे पर एक कलंक है. हर साल 6 दिसंबर देश की अल्प्संखयक मुस्लिम समुदाय के घावों को हर कर देता है. इसी दिन न केवल सत्ता की मिलीभगत से मुस्लिमों की इबादतगाह को शहीद किया गया था. बल्कि उनके खून से होली भी खेली गई थी.

उन्ही में से एक बाबरी मस्जिद के इमाम हाजी अब्दुल गफ्फार के पोते मोहम्मद शाहिद हैं. जिन्होंने इस दिन अपने पिता और चाचा को खो दिया था. जालिम कारसेवकों ने उनके पिता और चाचा को अयोध्या की सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर बेरहमी के साथ मार डाला था. इमाम हाजी अब्दुल गफ्फार ने ही आखिरी बार 1949 में बाबरी मस्जिद में नमाज अदा कराई थी.

शाहिद के अनुसार, ‘तब मैं महज 22 साल का था. हमारा घर आसानी से भीड़ का निशाना बन गया. क्योंकि ये मुख्य सड़क पर था. जब लोग आक्रोशित होकर चिल्लाते रहे थे. तब भीड़ में से किसी ने बताया कि यह घर मुस्लिम का है. ऐसे में मेरे पिता और चाचा ने भागने की कोशिश की लेकिन भीड़ ने उनका पीछा किया और वो मारे गए.

उन्होंने बताया, भीड़ ने हमारे रोजगार का मुख्य साधन रही आरा मशीन को आग लगा दी. उन्होंने सागौन और शीशम की लकड़ियों को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने कुछ नहीं छोड़ा, सब जला दिया. शाहिद कहते है कि उनके परिवार को पिता की मौत के बदले में दो लाख रुपए का मुआवजा मिला. जबकि हमारे परिवार में चार बहनें और छह भाई हैं.

बाबरी मस्जिद मस्जिद मामले में समझौते को लेकर शाहिद कहते है जो मुसलमान अदालत के बाहर निपटारे की बात करते हैं वो बिक चुके हैं. लेकिन मैं सम्मान के बिना नहीं रह सकता. इसलिए वो बाबरी मस्जिद की जमीन पर अपना दावा नहीं छोड़ेंगे.

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