जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) के अल्पसंख्यक दर्जे  को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में दाखिल किये गए हलफनामे को लेकर मुस्लिम नेताओं ने मोदी सरकार की तीखी आलोचना की है.

मंगलवार को जारी बयान में मुस्लिम नेताओं ने चेतावनी दी कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के इस ‘संकीर्ण विचार’ वाले दृष्टिकोण से न सिर्फ मुसलमानों का नुकसान होगा बल्कि देश का भी होगा. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस ऐतिहासिक संस्था के अल्पसंख्यक चरित्र को बचाने के लिए पूरी ताकत से लड़ेंगे.

अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों (एनसीएमईआई) के पूर्व अध्यक्ष, न्यायमूर्ति एमएसए सिद्दीकी ने अपने कार्यकाल के दौरान, फरवरी 2011 में जेएमआई के अल्पसंख्यक स्तर को बहाल करने के ऐतिहासिक फैसले को सौंप दिया था. उन्होंने कहा कि यदि आप संसद में होने वाली बहस को गौर देखेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार इस बात पर सहमत हुई थी कि उसका अल्पसंख्यक चरित्र बरकरार रहेगा.

उन्होंने 1988 अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि जामिया एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और यह गलत है कि संसद द्वारा किसी अधिनियम के पास होने के बाद जामिया एक विश्वविद्यालय के रूप में अस्तित्व में आया.

वहीँ दिल्ली राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष डॉ जफरुल इस्लाम खान ने कहा कि वर्तमान सरकार जामिया के अल्पसंख्यक चरित्र के बारे में झूठ फैलाने के लिए एक नीति के रूप में संसद अधिनियम का उपयोग कर रही है. उन्होंने कहा, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अल्पसंख्यक स्थिति के बारे में भी सरकार यही नीति अपना चुकी है.

खान ने  बताया कि यह सरकार पिछली सरकारों के कार्यों और निर्णयों को खारिज कर नई परंपराएं स्थापित कर रही है. उन्होंने पिछली सरकार की तारीफ़ करते हुए कहा कि ” पिछली सरकारों की एक अच्छी तरह से स्थापित परंपरा थी कि सरकार ने पिछली सरकार के किसी भी स्टैंड को कभी भी उलटा नहीं था.

उन्होंने चेतावनी दी, “मुसलमानों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई से न केवल समुदाय को नुकसान पहुंचेगा बल्कि देश को भी नुकसान होगा.” खान ने कहा, वे देश को अपने शब्दों पर चलाना चाहते हैं और फ़ैसिस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं जो कि भारत को खतरे में डालेगा. उन्होंने कहा, सभी देशों की प्रगति के लिए शांति की आवश्यकता है लेकिन सरकार (सरकार) की कार्रवाई लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर आने के लिए मजबूर करेगी.

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