Wednesday, June 29, 2022

समलैंगिकता पर बोले मुस्लिम धर्मगुरु – ओरतों का काम करेंगे आदमी तो उनका क्या होगा ?

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गुरुवार को सेक्शन 377 के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने फैसला सुनाते हुए LGBT समुदाय के रिश्तों को मान्यता प्रदान कर दी है। बेंच ने एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत सहमति से परस्पर अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध था।

इस मामले में मुस्लिम धर्मगुरुओ की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे राशिद ने कहा कि अगर आदमी किसी आदत का शिकार हो जाता है और वह उसकी जरूरत बन जाती है तो यह जरूरी नहीं है कि इसे पूरी मानवता के लिए जरूरी कर दिया जाए। मैं इस मसले को मजहबी रंग नहीं देना चाहता हूं, लेकिन मुझे लगता है कि समलैंगिक संबंध महिलाओं के अधिकार के खिलाफ है, अगर पुरुष महिलाओं का काम करेंगे तो महिलाएं क्या करेंगी। जबतक भारतीय संस्कृति जिंदा है समलैंगिकता ना सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि जघन्य अपराध है।

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील कमाल फारुकी ने कहा कि समलैंगिक संबंधों को दंडनीय अपराध करार दिया जाना गलत था, लेकिन कोई अपने बंद कमरे में क्या कर रहा है इसमे पुलिस का हस्तक्षेप नहीं हो सकता है। लेकिन अगर यह समाज को नुकसान पहुंचाता है और देश की संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है, तो पर्सनल लॉ बोर्ड की निश्चित भूमिका है, यह ना सिर्फ मुसलमानों के लिए बल्कि पूरे देश के नागरिकों के लिए जरूरी है।

बता दें कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की थी और 10 जुलाई को सुनवाई शुरु होने के बाद 17 जुलाई को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जहां तक एकांत में परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन कृत्य का संबंध है तो यह न तो नुकसानदेह है और न ही समाज के लिए संक्रामक है।

सीजेआई ने टिप्‍पणी की, ‘किसी को भी उसके व्‍यक्तिगत अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। समाज अब व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता के लिए बेहतर है। मौजूदा मामले में विवेचना का दायरा विभिन्‍न पहलुओं तक होगा।’

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