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नई दिल्ली – राजधानी नई दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर जिला मुज़फ़्फ़रनगर में 5 साल पहले हुए दंगों ने लोगों को कई जख्म दिये थे। धर्म के नाम पर हुए इस खूनी खेल में ने केवल मुज़फ़्फ़रनगर की छवि बल्कि यहाँ के सौहार्द को भी बड़ा नुकसान पहुंचा था। 60 हज़ार के लगभग लोग शिविरों में रहने पर मजबूर हुए।

पांच वर्ष पूर्व जब क्षेत्र सांप्रदायिकता की आग में यह इलाका झुलस रहा था।उस वक्त भोपा क्षेत्र के गांव नंहेड़ा में एक हिंदू परिवार जाट बाहुल्य गांव में स्थित 120 वर्ष पुरानी मस्जिद की हिफाजत कर रहा था। 59 साल के रामवीर बताते है कि उन्होने हमले के दौरान इस मस्जिद को बचाने के लिए लोगों को इकट्ठा कर लिया था।

भोपा क्षेत्र के गांव नंहेड़ा की आबादी लगभग 3500 है। ब्रिटिश काल में गांव में मुस्लिम परिवार काफी संख्या में रहते थे।लेकिन बाद में मुस्लिम परिवार एक-एक करके गांव से पलायन करते चले गए। रामवीर 1995 से ही मस्जिद की देखरेख कर रहे है।

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पेशे से मिस्त्री रामवीर सुबह मस्जिद को साफ करते हैं, शाम को मोमबत्तियां जलाते हैं और हर रमजान से पहले पुताई भी करवाते हैं। वह कहते हैं कि यह उनका धार्मिक कर्तव्य है। उनका कहना है, ‘मेरा विश्वास मुझे सभी प्रार्थना की सभी जगहों का सम्मान करने के लिए कहता है।’

रामवीर मस्जिद से केवल 100 मीटर की दूरी पर रहते हैं। वह बताते हैं कि बचपन में वह इसके आसपास खेलते थे। वह कहते हैं, ‘मेरे लिए यह पूजा की जगह है जिसका सम्मान होना चाहिए। उसकी देखभाल के लिए कोई नहीं था, मैंने जिम्मेदारी ले ली। पिछले 25 साल से मैं रोज इसकी सफाई करता हूं और मरम्मत का ध्यान रखता हूं।’

पास के खेड़ी फिरोजाबाद गांव में रहने वाले खुशनसीब अहमद बताते हैं, ‘मैं कुछ साल पहले ननहेडा गया था और यह देखकर हैरान रह गया था कि एक हिंदू शख्स मस्जिद की देखभाल कर रहा है। मैंने वहां नमाज की। नफरत को काटने वाले प्रेम और सौहार्द के कई उदाहरण मौजूद हैं।

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