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MSO जाफराबाद यूनिट के तत्वाधान में जंगे आज़ादी में मुस्लिम उलेमा का किरदार पे एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमे 53 स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिया. कार्यकर्म की शुरुवात राष्ट्रगान से हुई बाद में सभी प्रतिभागियों ने दिए गए विषय पर अपनी बात रखी, सभी प्रतिभागियों के लिए 4 मिनट का समय दिया गया था. शादाब अनवर को प्रथम, अख्तर रज़ा को सेकण्ड, तथा रहबर हुसैन को तीसरा स्थान मिला. अन्य 7 लोगो को भी मैडल दिया गया, जबकि अन्य 10 लोगो को सर्टिफिकेट दिया गया.

0c2मुख्य अतिथि अब्दुल वाहिद ने कहा कि पहली जंग-ए-आज़ादी के सबसे काबिल पैरोकार एक सूफी-फ़कीर थे. जब आज़ादी की कहीं चर्चा भी नहीं थी उस वक्त फिरंगियों की बर्बरता के विरुद्ध उन्होंने पर्चे लिखे, रिसाले निकाले और देश में घूम-घूम कर अपने तरीके से लोगों को संगठित किया। वे मौलवी हाफिज अहमद उल्लाह शाह, सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि नामो से मशहूर थे. जैसे उनके कई नाम थे ठीक वैसे ही उनकी शख़्सियत के कई आयाम भी थे. 1857 की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति को धता बता कर हिन्दू-मुसलमान कदम से कदम मिलाकर साथ-साथ लड़े थे. हर मोर्चे पर हालात यह थे कि इंच-इंच भर जमीन अंग्रेजों को गवानी पड़ी या देशवासियों के लाशों के ऊपर से गुज़रना पड़ा.

0c1MSO के मेराज ने कहा कि स्वन्त्रता दिवस 15 अगस्त भारत के ऐतिहास सबसे महत्वपूर्ण तारिख हैं, आज ही के दिन भारत ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद होकर एक स्वतंत्र राज्य बना था. इस दिन को हम स्वन्त्रता दिवस के नाम से जानते हैं. भारत को ब्रिटिश हुकूमत आज़ादी दिलाने में अनगिनत स्वतंत्रा सेनानी जिन्होंने इस देश की आजादी के लिए अपनी जान की क़ुरबानी दी. देश की आजादी के लिए हुए कुर्बान इतिहास के पन्नों में अनगिनत मुस्लिम हस्तियों के नाम दबे पड़े हैं जिन्होने भारतीय स्वतंत्रा आंदोलन में अपने जीवन का बहुमूल्य योगदान दिया जिनका ज़िक्र भूले से भी हमें सुनने को नहीं मिलता हैं. जबकि अंग्रेजों के खिलाफ भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है.

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हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया। टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसा योद्धा भी था जिसकी दिमागी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए.

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