Tuesday, July 27, 2021

 

 

 

बाबरी विध्वंस का दिन हमारे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के लिये दुखदायी था: मनमोहन सिंह

- Advertisement -
- Advertisement -

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मौलिक स्वरूप बताते हुये कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करें। उन्होंने सुरक्षा बलों से आग्रह किया कि उन्हें धार्मिक अपीलों से दूर रहना चाहिए।

उन्होने धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मौलिक स्वरूप बताते हुए कहा, ‘सबसे पहले एक संस्था के रूप में न्यायपालिका के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप का संरक्षण करने की अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज न करे।’

डॉ. सिंह ने मंगलवार को कॉमरेड एबी वर्धन स्मृति व्याखान को संबोधित करते हुए कहा, ‘संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का संरक्षण करने के मकसद को पूरा करने की मांग पहले के मुकाबले मौजूदा दौर में और भी अधिक जरूरी हो गई है। राजनीतिक विरोध और चुनावी मुकाबलों में धर्मिक तत्वों, प्रतीकों, मिथकों और पूर्वाग्रहों की मौजूदगी भी काफी अधिक बढ़ गई है।’

मनमोहन ने कहा कि सैन्य बलों को भी धार्मिक अपीलों से खुद को अछूता रखने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल देश के शानदार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि सशस्त्र बल स्वयं को सांप्रदायिक अपीलों से अछूता रखें।

पूर्व प्रधानमंत्री ने बाबरी मस्जिद मामले का जिक्र करते हुये कहा कि 1990 के दशक के शुरुआती दौर में राजनीतिक दलों और राजनेताओं के बीच बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के सह अस्तित्व को लेकर शुरू हुआ झगड़ा असंयत स्तर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा ‘बाबरी मस्जिद पर राजनेताओं के झगड़े का अंत उच्चतम न्यायालय में हुआ और न्यायाधीशों को संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को पुन: परिभाषित कर बहाल करना पड़ा।’

डा. सिंह ने बाबरी मस्जिद ध्वंस को दर्दनाक घटना बताते हुए कहा ‘छह दिसंबर 1992 का दिन हमारे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के लिए दुखदायी दिन था और इससे हमारी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं को आघात पहुंचा।’ उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने एस आर बोम्मई मामले में धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मौलिक स्वरूप का हिस्सा बताया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles