चेन्‍नै: सामान्‍य वर्ग (जनरल कैटिगरी) के गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण देने के कानून पर मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है। हाई कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार 18 फरवरी तक इस मुद्दे पर अपना जवाब दाखिल करे।

डीएमके के संगठन सचिव आरएस भराती की याचिका पर हाई कोर्ट ने यह नोटिस जारी किया है। भराती ने केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती दी है। इससे पहले डीएमके सांसदों ने संसद में भी बिल के विरोध में वोट किया था।

डीएमके सांसद कनिमोझी ने मांग की थी कि इस बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए। पार्टी का कहना है कि कोटा सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित होना चाहिए न कि आर्थिक स्थिति पर। बता दें कि पिछले सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए शिक्षा और नौकरियों में 10% आरक्षण वाले बिल को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी थी।

इसके साथ ही अब सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सामान्य वर्ग के परिवार जिनकी आमदनी 8 लाख रुपए सालाना से कम है वो 10 फीसदी आरक्षण हासिल कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण का यह प्रावधान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को मिलने वाले 50 फीसदी आरक्षण से अलग है। इसके लिए संसद ने 124वां संविधान संशोधन किया है।

केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया कि संविधान (124वां संशोधन) अधिनियम, 2019 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है।  इसके जरिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन किया गया है।

इसके जरिए एक प्रावधान जोड़ा गया है जो नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर किसी तबके की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है। यह विशेष प्रावधान निजी शैक्षणिक संस्थानों सहित शिक्षण संस्थानों, चाहे सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हो या न हो, में उनके दाखिले से जुड़ा है।

हालांकि यह प्रावधान अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर लागू नहीं होगा। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह आरक्षण मौजूदा आरक्षणों के अतिरिक्त होगा और हर श्रेणी में कुल सीटों की अधिकतम 10 फीसदी सीटों पर निर्भर होगा।

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