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गुड़गाँव । हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य, निजी हाथो में जाने के बाद किस क़दर महँगी हो चुकी है इसकी बानगी गुड़गाँव के फ़ोर्टिस अस्पताल में देखने को मिली जहाँ एक 7 साल की बच्ची डेंगू से मर गयी लेकिन अस्पताल ने उसके पिता को 16 लाख का बिल थमा दिया जिसमें क़रीब 3 लाख रुपय केवल ग्लव्ज़ का बिल था। यह एक अकेला मामला नही है। रोज़ाना न जाने कितने मरीज़ इन निजी अस्पतालों की लूट का शिकार बनते है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार द्वारिका के रहने वाले जयंत सिंह की 7 साल की बेटी अदया को 27 अगस्त की रात को तेज़ बुखार हुआ। जिसके बाद जयंत सिंह उसे द्वारका के सेक्टर 12 के रॉकलैंड हॉस्पिटल में ले गए। जहाँ उसे तुरंत भर्ती कर लिया गया। जयंत ने बताया की उनकी बच्ची को एक ऐसे कमरे में रखा गया जहाँ बग़ल में स्वाइन फलु का मरीज़ लेटा हुआ था। जब हमने इसका विरोध किया तो कमरा बदल दिया गया।

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जयंत के अनुसार 31 अगस्त को जाँच में पता चला की अदया को टाइप 4 का डेंगू है। इसलिए रॉकलैंड के डॉक्टर ने हमें उसे दूसरे अस्पताल में शिफ़्ट करने के लिए कहा। हम तुरंत अपनी बच्ची को गुड़गाँव के फ़ोर्टिस अस्पताल में ले गए जहाँ उसे तुरंत वेंटिलेटर पर रख दिया गया। तीन दिनो तक उसे बेहोश रखा गया। यही नही वीकेंड होने के कारण चौथे और पाँचवे दिन हमारी बच्ची को कोई डॉक्टर देखने भी नही आया।

जयंत ने आगे बताया की 15 सितम्बर को डॉक्टर ने अदया को मृत घोषित कर दिया। इसके बाद क़रीब दो हफ़्ते के इलाज के लिए मुझे 16 लाख का बिल थमा दिया गया। इसमें ब्रैंडेड दवाइयों के लिए 4 लाख रुपये, चिकित्सा सामग्रियों, जिसमें 17,142 रुपये के 2700 ग्लव्ज भी शामिल थे का बिल 2.73 लाख रुपय,चिकित्सा जांच (ब्लड टेस्ट) का बिल 2.17 लाख रुपय शामिल है। जबकि वहाँ सस्ती दवाइयाँ भी उपलब्ध थी।

फ़िलहाल इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने परिवार का समर्थन किया है और उनसे पूरे मामले को [email protected] पर मेल करने के लिए कहा है। उधर अस्पताल प्रशासन का कहना है की लड़की को डेंगू था और उसकी हालत बेहद गंभीर थी। लड़की को पिछले अस्पताल की चिकित्सा सलाह के बिना हमारे पास लाया गया था। 14 सितंबर को उसे परिवार के कहने और डॉक्टर के विरोध के बावजूद वेंटिलेटर से हटा दिया गया।

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