नेताओं के चुनावी वादों के अधूरे रहने को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जेएस खेहर ने शनिवार को कहा कि चुनावी वादे हमेशा अधूरे रह जाते हैं. ऐसे में अब इस बारें में राजनीतिक पार्टियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र में आर्थिक सुधार और आर्थिक तथा सामाजिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्य के बीच कोई तालमेल नहीं दिखता. उन्होंने आगे हा कि राजनीतिक दल के सदस्य चुनावी वादे पूरा ना होने पर बहाने देते है और उसे ही सही ठहराते हैं.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के मौजूदगी में खेहर ने कहा कि हालांकि राजनीतिक दल आर्थिक सुधार और वैश्वीकरण की बातें अपने घोषणापत्र में करते हैं, लेकिन वे एससी/एसटी और समाज के अन्य कमजोर वर्गो के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्य के साथ आर्थिक विकास की उपलब्धियों को कभी भी नहीं जोडते हैं. यह ध्यान दिलाते हुए कि अलग-अलग दलों के घोषणापत्र बिल्कुल एक जैसे हैं.

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

खेहर ने कहा कि समस्या उनके क्रियान्वयन में उत्पन्न होती है, जब पूंजी उत्पादन को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. संविधान में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में वर्णित सामाजिक-आर्थिक न्याय के लक्ष्य के साथ दलों के घोषणापत्र का कोई संबंध नहीं है.

खेहर ने कहा कि संवैधानिक मूल्यों के बारे में बात करना हमेशा आसान होता है और सबकुछ सार में बात करना अधिक आसान होता है. लेकिन सवाल संवैधानिक साधनों के माध्यम से लोगों को अच्छा प्रशासन मुहैया कराने के लिए आर्थिक व्यवस्था कैसे संचालित करें इसका है. उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक विकास को आर्थिक न्याय और आर्थिक सद्भाव के साथ जोडना होगा.

Loading...