Tuesday, August 3, 2021

 

 

 

जामिया छात्रों को राहत देने से कोर्ट ने किया इंकार तो वकील बोले – शेम-शेम…

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नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जामिया इलाके में हिंसक प्रदर्शन करने वाले छात्रों की गिरफ्तारी को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इंकार कर दिया है। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा था कि इस मामले में वो हाईकोर्ट जाएं।

इस दौरान छात्रों का पक्ष रखते हुए वकील ने कोर्ट को कुछ वीडियो का हवाला दिया और कहा कि इनमें कुछ पुलिसकर्मी बस की सीट पर कुछ डाल रहे हैं जिससे यह दिखाया जा सके कि छात्रों ने ही बस को जलाया था और पुलिस को एक्‍शन का मौका मिल जाए। इस दौरान वकीलों ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई रोकने और गिरफ्तार छात्रों को अंतरिम सुरक्षा देने की मांग की। कोर्ट ने जब इस मांग को खारिज कर दिया तो वकीलों ने कोर्ट में ही ‘शेम-शेम-शेम’ के नारे भी लगाए।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से एक छात्र की आंख की रोशनी चली गई। इस मामले में एसआईटी गठित कर जांच कराई जाए या तो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या फिर इस कोर्ट के जज की निगरानी में जांच हो। अगर दिल्ली पुलिस खुद ही जांच करेगी तो कोई सबूत नहीं आ पाएगा।

यूनिवर्सिटी के चीफ प्रॉक्टर ने पुलिस को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी थी। तकरीबन 52 छात्रों को गंभीर चोटे आईं, पुलिस ने हिरासत में लिए गए छात्रों को चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध नहीं कराई। हम मांग करते हैं कि किसी रिटायर्ड जज से कोर्ट की निगरानी में जांच कराई जाए और पुलिस को छात्रों के खिलाफ कार्रवाई से रोका जाए। छात्रों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव किया गया।

याचिकाकर्ता की वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि दिल्ली पुलिस की तरफ से 450 आंसू गैस के गोले छोड़े गए। ऐसी क्या इमरजेंसी थी। अभिव्यक्ति की आजादी सबको है। दिल्ली पुलिस की इस कारवाई को दो स्तर पर परखा जाना चाहिए। क्या पुलिस ने ये कार्रवाई नियम के तहत की या ये कार्रवाई अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए थी।

याचिकाकर्ता की तरफ से इंदिरा जयसिंह ने कहा कि हिंसा की किसी को इजाजत नही दी जा सकती लेकिन लोकतंत्र में अपनी बात रखना भी संवैधानिक अधिकार है। पुलिस ये बताए कि क्या उनको मस्जिद, लाइब्रेरी और टॉयलेट में घुसने के लिए किसी ने कहा था। किस स्थिति में ये परिस्थितियां पैदा हुई। अभी भी वहां की स्थिति सामान्य नहीं है। छात्र डरे हुए हैं।

इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट में कहा कि सिविल सोसाइटी के प्रेशर की वजह से पुलिस ने हिरासत में लिए गए छात्रों को छोड़ा है। केवल यही नहीं पुलिस के द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द भी ऐसे थे कि हम बता नहीं सकते। क्या लॉ एंड आर्डर के नाम पर पुलिस इस तरह की बर्ताव करेगी? एक ऐसा कमेटी बनानी चाहिए जिसमें हर कोई आकर अपनी बात रख पाए। जिसके पास जो भी साक्ष्य हैं वो आकर दें। मैं कोर्ट से दरख्वास्त करूंगी कि वो इस मामले में भी कोई ऐसा ऑर्डर पास करे जैसा कि कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए तीस हजारी कोर्ट में वकीलों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद दिया था।

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