तिरुवनन्तपुरम | मीडिया को किसी भी देश का चौथा स्तम्भ कहा जाता है. इसलिए समाज के प्रति मीडिया की जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा होती है. खासकर टीवी मीडिया का हमारे समाज में अहम् योगदान है. इसका काम समाज को आइना दिखाने का भी होता है. हर संवेदनशील मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए एक्सपर्ट पैनल के साथ आपको सच्चाई से रुबुरु कराता है. लेकिन जो हम कह रहे है क्या वो आजकल के टीवी मीडिया के लिए सही है?

शायद आप पेशोपेश में पड़ गए होंगे. चलिए हम आपको मंगलवार को आई केरल हाई कोर्ट की एक टिप्पणी की और लिए चलते है. इससे आपके मन की शंकाओं को छांटने में थोड़ी मदद जरुर मिल जाएगी. केरल हाई कोर्ट ने टीवी न्यूज़ चैनल पर होने वाली बहस को स्तरहीन बताते हुए कहा की टीवी चैनल शिष्टता, विन्रमता और पेशेवर आचार की सारी सीमाए लांघ रहे है.

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कोर्ट ने अपनी प्रतिक्रिया में उन लोगो को भी लपेटे में लिए जो इन बहस में पैरोकार बनकर शामिल होते है. एक मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पी ओबैद ने यह टिप्पणी की. दरअसल अदालत में सतर्कता विभाग के निदेशक थॉमस को हटाने सम्बन्धी एक याचिका पर सुनवाई चल रही है. इस मामले में अदालत ने सर्तकता विभाग को फटकार लगाते हुए कहा था की निदेशक थॉमस अपने पद पर अभी भी कैसे बने हुए है जबकि उनकी कार्यवाहिय अराजक है.

जस्टिस ओबैद की इस टिप्पणी पर मलयाली टीवी न्यूज़ चैनल पर बहस शुरू हो गयी. चैनल पर हो रही बहस से खिन्न होकर केरल हाई कोर्ट ने मंगलवार को कड़ी प्रतिक्रिया दी. जस्टिस ओबैद ने कहा की विभिन्‍न टीवी चैनलों ने बिना यह समझे-बूझे डिबेट आयोजित कर दी कि कोर्ट में वास्‍तव में हुआ क्‍या था. यह बात गलत और गैर-जिम्‍मेदाराना तरीके से प्रसारित की गई कि इस अदालत ने सरकार को वीएसीबी का निदेशक बदलने का निर्देश दिया है.

जस्टिस ओबैद ने कहा की न्यूज़ चैनल ने उनके शब्दों की गलत व्याख्या की है. हमने सतर्कता विभाग के निदेशक की अराजक कार्यवाहियो पर जरुर टिप्पणी की और सरकार से यह पुछा की वो इनको नियंत्रिक करने के लिए कार्यवाही क्यों नही कर रही है? लेकिन अब न्यूज़ चैनल पर होने वाली बहस सीमाए लांघ रही है इसलिए क्यों न इन बहसों कोन्‍याय दिलवाने की प्रक्रिया में दखलंदाजी के तौर पर लिया जाना चाहिए.

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