जम्मू के कठुआ जिले के रासना गाँव में आठ साल की बच्ची के साथ मंदिर में सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में पीड़िता की पहचान को उजागर करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मीडिया को सलाह दी कि रेप मामले में किसी भी तरह से पीडिता की पहचान उजागर नहीं होनी चाहिए.

जस्टिस मदन बी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 228- ए का मुद्दा उठाये जाने पर कहा, ‘मृतक की गरिमा के बारे में भी सोचिए. इसे (मीडिया रिपोर्टिंग) नाम लिए बगैर भी किया जा सकता है. मृतक की भी गरिमा होती है.’ धारा 228- ए यौन हिंसा के पीड़ितों की पहचान उजागर करने से संबंधित है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में भी जहां बलात्कार पीड़ित जीवित हैं, वह नाबालिग या विक्षिप्त हो तो भी उसकी पहचान का खुलासा नहीं करना चाहिए क्योंकि उसका भी निजता का अधिकार है और वे पूरी जिंदगी इस तरह के कलंक के साथ जीवित नहीं रह सकते.

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दरअसल, इन्दिरा जयसिंह ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 228- ए के बारे में शीर्ष अदालत का स्पष्टीकरण जरूरी है. उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं की रिपोर्टिंग करने पर मीडिया पर ‘पूरी तरह प्रतिबंध’ नहीं लगाया जा सकता. शीर्ष अदालत को प्रेस की आजादी और पीड़ित के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा. पीठ ने कहा कि वह धारा 228- ए से संबंधित मुद्दे पर गौर करेगी.

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह ही 12 मीडिया घरानों को कठुआ बलात्कार पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करने की वजह से दस दस लाख रूपए बतौर मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया था. इन मीडिया घरानों ने पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करने पर हाईकोर्ट से क्षमा भी मांगी थी.

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