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बीते 10 जनवरी को आठ साल की बच्ची का अपहरण कर उसके साथ मंदिर में सामूहिक रे’प और फिर ह’त्या करने के मामले में पीड़ित परिवार को अब भी आरोपियों की और से लगातार धमकाया जा रहा है। जिसके चलते वे अपने घर पहुंचने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है।

न्यूज18 के मुताबिक बच्ची के माता-पिता सबीना और याकूब (बदले हुए नाम) कारगिल चोटी से सांबा की तरफ कई किलोमीटर पैदल चल अपने घर से 25 किलोमीटर करीब पहुँच चुके है। लेकिन दोबारा गांव पहुंचने की कोशिश कर रहे इन लोगों को धमकी दी जा रही है।

सबीना ने बताया, ”कुछ लोगों ने हमें यहां देख लिया था। हमें गांव से बाहर निकालने की धमकी दी जा रही है। हमसे कहा जा रहा है कि हमारे चलते ही कुछ लोगों को जेल जाना पड़ा।” ऐसे में सबीना और याकूब बेहद डरे हुए हैं।  पास के झरने से पानी लाने में भी इन्हें डर लगता है।

याकूब को कारगिल से पठानकोट के 530 किलोमीटर के लंबे रास्ते के दौरान खर्चे के लिए कई भेड़ और बकरियां बेचनी पड़ीं। उन्होंने कहा, ”मुझे तीन से चार बार कोर्ट जाना पड़ा. मैंने खर्चों के लिए कुछ भेड़ और बकरी बेच दी। मैं अपनी बच्ची को न्याय दिलाने के लिए सारी संपत्ति बेच दूंगा।”

सबीना चाहती है कि हत्या’रे को फांसी की सज़ा मिले।  लेकिन उन्हें इस बात का भी डर लग रहा है कि अगर दोषी को फांसी की सज़ा मिलती है तो फिर उनकी जान को भी खतरा है। उन्होंने कहा, ”हम सबको मा’र दिया जाएगा।” अगर इन दोनों के पास कोई विकल्प होता तो ये यहां वापस नहीं आते। यहां आने से पहले जमीन की तलाश की लेकिन उन्हें नहीं खरीद सके। दोनों यहां अकेले हैं, अपने बच्चों को डर से अपने रिश्तेदारों के पास छोड़ दिया है।

सबीना और याकूब का कहना है कि उन्हें किसी तरह का अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। अप्रैल में, जम्मू-कश्मीर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण ने परिवार को 2 लाख रुपये के मुआवजे को मंजूरी दे दी। लेकिन याकूब कहते हैं कि कहते हैं, “हमें एक पैसा नहीं मिला है।”

उसके पास 200 बकरियां और भेड़ें हैं, और 14 घोड़े हैं। रसाना में उनके पास एक छोटा सा घर है। उनके पास करीब दो एकड़ एकड़ ज़मीन भी है। वे पिछले कई दशकों से उस घर में रह रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें परेशान किया है।

याकूब ने कहा, “वे अक्सर बकरवाल लड़कों को मारते थे वे हमें गालियां देते थे। लेकिन हमने इन चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। हमने सोचा था कि ये चीजें होती रहती हैं। पीने के पानी तक के लिए हमें गांववालों के भरोसे रहना पड़ता है। गांव में एक कुआं है जो उनके नियंत्रण में है। अब हमें वहां से पीने के पानी के लिए परमिशन लेनी पड़ती है।”

उनका कहना है कि अगर वो अपना घर बेचना भी चाहे तो भी नहीं बिकेगा । उन्होंने कहा, ”बहुसंख्यक समुदाय चाहते हैं कि हम यहां से बाहर रहें। लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई भी बकरवाल हमारी ज़मीन खरीदने की हिम्मत करेगा।”

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