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चेन्नई | तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अंतिम विदाई ले ली है. उनको मरीन बीच पर एम्जीआर के स्मारक के पास दफना दिया गया. अब अम्मा कभी नही उठेगी, वो चिरं निंद्रा में सो गयी. उनके लाखो समर्थक आज उनको अंतिम विदाई देने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए. यह वो मार्मिक द्रश्य था जिसको देख कोई भी भावुक हो सकता था. हर तरफ रोने की गुजं सुनाई दे रही थी. चारो तरफ उनके चाहने वालो का हुजूम रो रहा था. वो कह रहा था , अम्मा वापिस आ जाओ.

मरीन बीच पर स्थित एम्जीआर स्मारक में जयललिता को दफनाया गया. करीब 4.30 बजे जयललिता के पार्थिव शरीर को राजा जी हॉल से मरीन बीच ले जाया गया. राजा जी हॉल से मरीन बीच की दुरी करीब दो किलोमीटर है. यह पूरा रास्ता जयललिता के समर्थको से पटा पड़ा था. जयललिता के समर्थक उनको अंतिम विदाई देने के लिए लाखो की संख्या में पहुंचे थे.

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मरीन बीच पर बने एम्जीआर स्मारक पर उनके पार्थिव शरीर को लाया गया. जयललिता की सबसे करीबी सहेली शशिकला ने उनके अंतिम संस्कार की सभी रस्मे पूरी की. चन्दन के बने ताबूत में जयललिता को दफना दिया गया. यह सबसे ज्यादा चौकाने वाला था. चूँकि जयललिता आयंगर ब्राह्मण थी, हमेशा माथे पर तिलक और मंदिर जाती थी फिर उनको दफ़नाने के क्या कारण थे? आयंगर ब्राहमण में भी शव का दाह संस्कार करने की परम्परा है.

जानकारों के मुताबिक जयललिता को दफ़नाने का कारण द्रविड़ आन्दोलन है. चूँकि उनकी पार्टी और वो खुद द्रविड़ आन्दोलन से जुडी हुई थी, जिसका मूल ही हिन्दू धर्म के रीती रिवाजो के खिलाफ था, के कारण उनको दफ़नाने का फैसला किया गया. द्रविड़ आन्दोलन से जुड़े लोग सैधांतिक रूप से ईश्वर को नही मानते और नास्तिक होते है. दूसरा कारण यह माना जा रहा है की चूँकि एम्जीआर को दफनाया गया था इसलिए जयललिता का अंतिम संस्कार भी इसी तरह किया गया.

एम्जीआर समर्थक मानते है की मरीन बीच पर आज भी एम्जीआर की घडी की टिक टिक सुनी जा सकती है. इसी तरह अगर अम्मा के समर्थक उनसे मिलना चाहते है तो वो यहाँ आकर अपनी मुराद पूरी कर सकते है. राज्य सरकार का इरादा इस जगह को स्मारक के तौर पर विकसित करने का है. यहाँ द्रमुक आन्दोलन से जुड़े तीन बड़े नेताओ के स्मारक होंगे. सबसे पहले अन्ना दुरई फिर एम्जीआर और अब जयललिता. वैसे बड़े लोगो को दफ़नाने की परम्परा काफी पहले से चली आ रही है.

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